Wednesday, 20 November 2013

विकास की ओर

तुम कहते हो कि
हम पिछड़े हैं,
तुम्हे क्यूँ विकास ये दिखता नहीं,
हम बढ़ रहे है विकास की  ओर.……
विकास महिला-अस्मिता को  तार-तार करने का,
विकास टूटे मन के साथ … अपनी बात कहने का …
विकास दिखावे का.…
विकास दिखावे का पर्दाफाश करने का
कोई कहता था कि बढ़ते बलात्कार के मामले अशिक्षा  से जन्में  हैं.…
तो फिर शिक्षा के साथ क्या जन्मा है ?
"मर्यादित यौन - उत्पीड़न"……

किसी ने कहा था -
महिलायें रात को सन्नाटे भरी गलियों में असुरक्षित हैं.....
तो फिर अकेली न होकर भी किसी अपने के साथ वो क्या हैं ?
उनकी वासना -पूर्ति का ज़रिया ?

लेकिन विकास यहीं नहीं रुकता …… 
विकास की  हदें बदल चुकी हैं ,
आवाज़ दबे शब्दों में ही सही …
सर उठा रही है …

कोई बाबा किसी नाबालिग को सीए की  जगह  डीएड की  डिग्री का लालच देकर भी ,
 अब शायद उसकी आवाज़ नहीं दबा सकता ……
आज अस्मिता भंग होने की स्थिति में भी वो दबे शब्दों से चीख-चीख कर कह रही है ,
मै  भी इस विकास का हिस्सा हूँ  ,
हम बढ़ ही तो रहे हैं विकास की  ओर!

        

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