इन दिनों देख रही हूँ,
एक गाँव को क़रीब से,
जो उसके और मेरे सपनों का गाँव है,
उस गाँव के किरदारों को देखते ही जी उठता है मेरा पहला प्यार,
उसके और मेरे बचपन की पसंद का वो आशियाना..
वो गाँव जहाँ न वो गया है और न ही मैं,
पर वो गाँव हमारे दिलों में बसता है...
क्यूँकि जो सच्चाई है इस गाँव के किरदारों के दिल में,
वैसी ही परछाईं है ओजस्विनी की हर महफिल में,
वो शमां जलाती है हर रोज़ सौन्दर्य के लिए,
पर सौन्दर्य भी अपनी आदतों की सोहबत से कहाँ कच्चा है ?
नहीं आता वो ओजस्विनी की चौखट पर आज भी,
क्यूँकि दिल से वो भी तो सच्चा है।।
उसे मुँह मोड़ कर गये एक बरस से भी अधिक बीत चुका है,
पर ओजस्विनी और सौन्दर्य ने अब तक एक -दूजे की सुध नहीं ली,
पर दोनों ही बड़ी शिद्दत से आज भी अपने प्यार को सींच रहे हैं,
ओजस्विनी आज भी शमां जला रही है और सौन्दर्य अपनी ज़िद से
उसे उतनी ही शिद्दत से बुझा रहा है ।
ये गाँव आप सबने देखा होगा,
जिसके किरदार बड़े ही सहज और सरल हैं,
जिनकी अपनी ही एक दुनिया है,
जो मेरी कहानी के दोनों किरदारों के संचार क्षेत्र का
समान अवयव है,
वो गाँव मालगुडी है , जहाँ ओज और सौन्दर्य के विचार- प्रेम का उद्भव है।।

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