Saturday, 24 August 2013

मेरी सड़क

यूँ तो हर बात हम फ़ौरन ही कहा करते थे,
पर इस बार ज़रा देर हुई ,ज़िन्दगी का एक रास्ता अब ख़त्म हुआ और फ़िर ...
खड़े हैं चौराहे पर हम.....एक रास्ता मंज़िल की तरफ जाता है ,
एक रास्ता घर की तरफ जाता है,
एक रास्ते पर ठोकरें इंतज़ार कर रही हैं....
एक रास्ते पर सुनहरी यादें खड़ी हैं....
यादों वाला रास्ता चुनना बेवकूफी है क्योंकि यादों के साथ मुस्कुरा कर किसी दूसरे रास्ते पर बढ़ जाना ही समझदारी है,
घर की तरफ़ रूख़ करने का मतलब है,मंज़िल को यहीं से अलविदा कह देना.....पर फिर चौराहे तक आने की जद्दोजहद बरबाद चली जायेगी......
मंजिल की तरफ़ सीधा जाने वाला रास्ता बड़ा ही सपाट सा और जल्दी पहुँचा देने वाला प्रतीत हो रहा है पर इस रास्ते पर ना जाने कितने ऐसे गढ्डे हैं जो दूर से नज़र नहीं आ रहे.......क्योंकि जितने भी लोग इस सड़क पर गये कभी उन्हें दुबारा इस चौराहे पर ना देखा ......
वो चौराहा जिसने इन्हें आगे तक जाने का रास्ता दिया.....
ये सब सोचकर वो ठोकरों वाला रास्ता नज़र आया.....
जिस पर कोई जाना नहीं चाहता....क्योंकि उसका उबड़-खाबड़पन पहले ही सबको विचलित सा कर देता है.....
उस रास्ते से मंज़िल भी नज़र नहीं आती क्योंकि वो इतना पथरीला है कि रास्ते का छोर दिखता ही नहीं...
पर मन कहता है कि इस रास्ते पर क़ामयाबी सौ फीसद पक्की है क्योंकि ये रास्ता भले ही पथरीला हो इसलिए
वक्त लगे पर ये रास्ता है बहुत छोटा.......इस रास्ते को चुनकर तू इस चौराहे को ना भूलेगी और वापस शुक्रिया अदा करने ज़रूर आयेगी......न घर छूटेगा,न यादें, न मंज़िल,और ठोकरें तो सदा से ही तेरी अपनी रही हैं...जो तुझसे अथाह प्रेम करती हैं.........

(अंतिम पंक्तियां लिखते हुए महान कवि Robert Frost याद आए जो कहते हैं-“Two roads diverged in a wood,&

  I Took The One less travelled by, And that has made all the difference” –( The Road not taken) से साभार..)

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