Saturday, 24 August 2013

मेरी सड़क

यूँ तो हर बात हम फ़ौरन ही कहा करते थे,
पर इस बार ज़रा देर हुई ,ज़िन्दगी का एक रास्ता अब ख़त्म हुआ और फ़िर ...
खड़े हैं चौराहे पर हम.....एक रास्ता मंज़िल की तरफ जाता है ,
एक रास्ता घर की तरफ जाता है,
एक रास्ते पर ठोकरें इंतज़ार कर रही हैं....
एक रास्ते पर सुनहरी यादें खड़ी हैं....
यादों वाला रास्ता चुनना बेवकूफी है क्योंकि यादों के साथ मुस्कुरा कर किसी दूसरे रास्ते पर बढ़ जाना ही समझदारी है,
घर की तरफ़ रूख़ करने का मतलब है,मंज़िल को यहीं से अलविदा कह देना.....पर फिर चौराहे तक आने की जद्दोजहद बरबाद चली जायेगी......
मंजिल की तरफ़ सीधा जाने वाला रास्ता बड़ा ही सपाट सा और जल्दी पहुँचा देने वाला प्रतीत हो रहा है पर इस रास्ते पर ना जाने कितने ऐसे गढ्डे हैं जो दूर से नज़र नहीं आ रहे.......क्योंकि जितने भी लोग इस सड़क पर गये कभी उन्हें दुबारा इस चौराहे पर ना देखा ......
वो चौराहा जिसने इन्हें आगे तक जाने का रास्ता दिया.....
ये सब सोचकर वो ठोकरों वाला रास्ता नज़र आया.....
जिस पर कोई जाना नहीं चाहता....क्योंकि उसका उबड़-खाबड़पन पहले ही सबको विचलित सा कर देता है.....
उस रास्ते से मंज़िल भी नज़र नहीं आती क्योंकि वो इतना पथरीला है कि रास्ते का छोर दिखता ही नहीं...
पर मन कहता है कि इस रास्ते पर क़ामयाबी सौ फीसद पक्की है क्योंकि ये रास्ता भले ही पथरीला हो इसलिए
वक्त लगे पर ये रास्ता है बहुत छोटा.......इस रास्ते को चुनकर तू इस चौराहे को ना भूलेगी और वापस शुक्रिया अदा करने ज़रूर आयेगी......न घर छूटेगा,न यादें, न मंज़िल,और ठोकरें तो सदा से ही तेरी अपनी रही हैं...जो तुझसे अथाह प्रेम करती हैं.........

(अंतिम पंक्तियां लिखते हुए महान कवि Robert Frost याद आए जो कहते हैं-“Two roads diverged in a wood,&

  I Took The One less travelled by, And that has made all the difference” –( The Road not taken) से साभार..)

Wednesday, 17 October 2012

आशिक-ए-लख़नऊ


एक वक़्त हो चला है तेरी महसूसियत से महरूम हुए,
मग़रूर हो तुम या कि मजबूर हो तुम,
हो पास या कि दूर हो तुम,
ऐ नवाब किस बेग़म के नशे में चूर हो तुम,
तुम्हें अपनी माशूक़ा की याद नहीं आती,
ऐ आशिक़-ए-लख़नऊ किस ओर हो तुम ?
दिल में खंजर सा चुभ रहा है , तेरी यादों का दामन,
मेरे जीने का सबब,मेरी ज़िन्दगी का दस्तूर हो तुम,
तुझ से बिछड़ के तहज़ीबो-अदब भी मुझसे रूठ गये,
हम तेरी बाज़ुओं से क्या दूर गये,

इसी इंतज़ार में जी रहे हैं हम,
कि मेरे नहीं तो किसी ग़ैर के सही,
पर किसी के आंचल में तो महफ़ूस हो तुम,
ऐ लख़नऊ बड़े दूर हो तुम।

Monday, 25 June 2012

भारत में डिजीटल विभाजन


मानव हित कथा (Human Interest Stories)
भारत में डिजीटल विभाजन

    मानव-सभ्यता के विकास के साथ-साथ ही संचार की प्रक्रिया का भी विकास हुआ और इस प्रक्रिया ने बदलते वक्त के साथ स्वयं को विभिन्न तकनीकों के साथ समायोजित करते हुए विकास के पथ का अनुसरण किया। चिन्हों,प्रतीकों के माध्यम से अपने विचारों का आदान-प्रदान करने वाले इस मनुष्य ने जब शब्दों को सीखा तो उन्हें कागज पर उतारना शुरू किया और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के विकास ने जब तकनीकी माध्यमों को जन्म दिया तो आज ऐसा समय आ पहुँचा है कि जब ये संचार के शब्द और सूचनायें हवा में तैर रहे हैं और अन्तरिक्ष में वह असीमित तथा अदृश्य स्थान जिसे हम साइबरस्पेस कहते हैं,सूचनाओं का भण्डारण ग्रह बन चुका है। सूचना एवं प्रद्योगिकी क्षेत्र में हुई त्वरित प्रगति ने एनेलॉग तकनीक से डिजीटल तकनीक की खोज का सफ़र पूरा किया और आज पूरा विश्व इस डिजीटलीकरण की गोद में समाने को तैयार दिखाई दे रहा है।                           
                                            
क्या है डिजीटलीकरण
    डिजीटलीकरण अथवा डिजीटाईज़ेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी भी सूचना अथवा जानकारी का संग्रहण अंकीकरण(digitization) के माध्यम से होता है। कम्प्यूटर में सूचनाओं को द्विआधारी  संखया पद्धति (two base number system) की सहायता से संरक्षित किया जाता है । इस संख्या पद्धति का आधार शून्य (0) तथा एक (1) होता है। अतः समस्त सूचनाओं को जब कम्प्यूटर में प्रवेश कराया जाता है तो वह शब्द हों,चित्र हों अथवा कोई अन्य जानकारी वह सभी को इसी रूप में अपने स्मृतिकोश में एकत्रित्र कर लेता है। इस तकनीक ने सूचनाओं की गति इतनी अधिक बढ़ा दी है कि पलक झपकते ही सूचनायें एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच जाती हैं।

डिजीटल-विभाजन और भारत
   डिजीटल-विभाजन एक ऐसी विचार धारा है जो कि इस बात का समर्थन करती है कि बढ़ता डिजीटलीकरण डिजीटल-समरूपक” (digital-equilizer) के रूप में अपनी भूमिका को निभा पाने में असक्षम रहा है। इसने समाज में डिजीटल-समृद्ध (digitaly-rich) और डिजीटल-दरिद्र (digitaly-poor) जैसे दो वर्गों का निर्माण कर दिया है और इन दो समाजों के बीच की खाई दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।                                                                                                                                                       भारत जो कि विविधताओं का देश है वह भी बड़ी ही तेज़ी से सूचना – प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपने क़दम लगातार बढा रहा है और इंटरनेट तथा मोबाइल का इस्तेमाल करने वाली जनसंख्या लगभग 700 मिलियन तक पहुँच चुकी है। मोबाइल तो गाँव-गाँव तक पहुँच चुके हैं। भारत – सरकार के प्रयास लगातार इस क्षेत्र में जारी हैं। रिमोट-एरिया (पूर्वोत्तर राज्यों और पहाड़ी इलाकों) तथा ग्रामीण इलाकों तक लोगों को सूचना के दायरे में लाने और डिजीटल- विभाजन की खाई को पाटने की कोशिश में सरकार ने  ग्रामीण संचार सेवक, ज्ञानदूत ,ई-सेवा प्रोजेक्ट तथा डिजीटल लाईब्रेरी प्रोजेक्ट तथा विद्या-वाहिनी जैसी योजनायें चलाई हैं।
     भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई मे वर्ष 2004 में एक सुविख्यात तकनीकी संस्थान एनलॉग (Enlog) द्वारा एक प्रोजेक्ट चलाया गया जिसके तहत आस-पास के ग्रामीण इलाकों को इंटरनेट के माध्यम से विश्व के साथ जोड़ने की योजना बनाई गई। इस कार्यक्रम की सबसे खास बात यह रही कि इन इलाकों में स्थापित किये जाने वाले बूथ और साइबर कैफे की कमान महिलाओं के हाथों में दी गई और वो भी ऐसी महिलाओं के हाथों में जो इससे पहले कभी भी तकनीक के सम्पर्क में नहीं आई थी।
     आईआईटी चेन्नई की आशा संजय कहती हैं- गाँवों के कुछ हिस्सों में तो लोग एक गाँव से अगले गाँव तक की बस पकड़ने में भी सक्षम नहीं थे लेकिन इंटरनेट ने उन्हें दुनिया से जुड़ने का मौका दिया। वे एक क्लिक पर ऐसा कर सकते हैं। यह बहुत बड़ी बात है।
     आशा संजय के इसी गाँव में वीडियो-कॉन्फ्रेन्सिंग के तहत महिलाओं की 60 कतारों को हज़ारों मील दूरी पर बैठे नेत्र-विशेषज्ञ (eye-specialist) से जोड़ा गया। अकेले तमिलनाडु में ही लगभग 1,000 साइबर-बूथ उपलब्ध हैं जिनमें से 80% महिलाओं द्वारा चलाये जा रहे हैं।                      
    एनलॉग के ग्राम आनन्द कहते हैं कि महिलाओं में सीखने और ग्रहण करने की क्षमता और अपने कार्य के प्रति ग़जब का समर्पण देखने को मिला। महिला-ऑपरेटर गाँवों के बूथ मे सुबह 6.30 बजे ही पहुँच जाती हैं जबकि शहरों मे हम अपने कार्यालय 10.00 बजे तक पहुँचते हैं।
21 वर्ष की अनन्ति अपने गाँव में डिप्लोमा करने और नौकरी पाने वाली एकमात्र महिला हैं जो इस बूथ को चलाकर गर्व का अनुभव कर रही हैं।
इसी प्रकार 67 वर्षीय रविया मार जो की मधुमेह से पीड़ित हैं अपने घर पर ही साइबर बूथ चलाकर खुश हैं क्योंकि वह कहीं जा नहीं सकतीं।

भारत में डिजीटल-विभाजन की वास्तविकता
इन सभी प्रयासों के बाद भी भारत में डिजीटल- विभाजन की खाई कम गहरी नहीं है। आज़ादी के समय भारत का साक्षरता प्रतिशत 12% था जो कि अब बढ़कर लगभग 74% तक पहुँच चुका है किन्तु इस साक्षर जनता में वे लोग भी शामिल हैं जो केवल अपने हस्ताक्षर करना जानते हैं। तकनीकी शिक्षा की कमी डिजीटल माध्यम से सूचनायें प्राप्त करने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। डिजीटल तकनीक यदि सभी तक पहुँच भी जाती है तो भी भारत की विभिन्न भाषाओं में सूचनाओं की कमी और भारत की तकनीकी एवं भाषायी(अंग्रेज़ी एवं हिन्दी) रूप से अशिक्षितता डिजीटल –विभाजन की खाई को निरन्तर बढ़ाती ही नज़र आयेगी।अतः यह आवश्यक है कि साक्षरता को आँकड़ों में नहीं बल्कि सही मायनों में व्यवहारिक रूप से बढ़ाया जाये।
      यदि ऐसा होता है तब ही मार्शल मैकलुहान की विश्व-ग्राम”(global-village) की परिकल्पना वास्तविक रूप से भारत के संदर्भ में सत्य सिद्ध हो सकेगी और तभी भारत का विश्व-बन्धुता(world-brotherhood) का सिद्धांत भी वास्तविक रूप से साकार हो सकेगा।
                                                                   सुन्दरम् ओझा
एम.एस.सी(द्वितीय सेमेस्टर)
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग
                                     माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं
                                                     संचार विश्वविद्यालय,भोपाल

  

Tuesday, 22 May 2012

ओजस्विनी की कहानी



       वो अजनबी रात....

एक दिन एक अजनबी रात,
जब मैं थी उनके पास,
पर मैं अकेली नहीं थी उस रात..
हर बार की तरह हमारे बीच सन्नाटा था..
मैं करती रही प्रतीक्षा उस सन्नाटे के चले जाने की,
पर उसे ना जाने क्यूँ मेरी हालत पे तरस नहीं आया..
इस रात की प्रतीक्षा में मैंने अनवरत् ही दो वर्ष गुजारे थे...

यही सोचकर मैंने सन्नाटे को दरकिनार कर..अपनी सीमाओं को पार कर...
बढ़ा दिया उनकी तरफ़ अपनी बाहों का हार...
पाने को उनका प्यार...
बह रही थी मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धार..
वो मेरे पास ही कर रहे थे विश्राम,
हल्का संगीत हमारे आस-पास विचार रहा था...
पर वो शायद आज भी यही चाहते थे कि मैं ही झुकूँ फ़िर से,
पर प्रिये मैं तो सदा से ही तुम्हारे सामने नतमस्तक थी...

ख़ैर अपने अहं को कुछ पल के लिए दूर कर...
बांधा मैंने तुम्हें अपने आलिंगन पाश में..
सिमट गई मैं तुम्हारी दौड़ती हर श्वांस में..
मेरा मस्तक तेरे ह्रदय पर था..
जो पत्थर सा कठोर था..
जैसे ही मेरे अश्रुओं की बूंदें गिरी उस कठोर पत्थर पर..
वो पिघल गया...  
तूने झट मुझे अपनी बाहों का सिराहना दिया..
प्रतिउत्तर में अपने आलिंगन का सहारा दिया..

मुझे ना कोई भय था,ना संकोच..
पर तेरी ह्रदयगति असाधारण थी..
तूने घबरा कर मुझसे कहा-मैंने क्या किया ?”
पर फ़िर सन्नाटा लौट आया हमारे बीच अपनी आंखे फाड़े..
पर इस बार तूने उसे हमारे कक्ष से बाहर भेज दिया..
मेरे बालों को सहलाते हुए तूने पूछा-ये आंसू ख़ुशी के हैं या ग़म के,इतना तो बता सकती हो?”
मैंने कहा- तुम मुझे नहीं चाहते!”
उन्होंने मुझे पुचकारते हुए कहा-अग़र मैं तुम्हें नहीं चाहता तो क्या तुम मेरी बांहों का तकिया बना पाती?”
मैंने कहा –मुझे ये तकिया जीवन भर क्यों नहीं मिल सकता?”
ये सवाल सुनकर उन्होंने लंबी आह भरते हुए कहा-मेरे दिल को बहुत चोट लगी है,मेरे पास तुम्हें देने को कुछ भी नहीं है।"
मैंने कहा-"आपके जीवन में स्थान के सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिेए।"

मैंने उन्हें और भी अधिक सामर्थ्य से स्वयं में जकड़ लिया था,
उनकी उंगलियाँ निरन्तर मेरे बालों को सहला रही थी।

उन्होंने मेरे मस्तक पर रख दिया अपना प्यारा सा चुम्बन.....और कर लिया था मेरा पूरा आलिंगन,
आज ऐसा प्रतीत होने लगा था कि "मैं तेरी 'ओजस्विनी' हूँ और तू मेरा ही "सौन्दर्य" है।

वो मुझे हँसाने की कोशिश करते रहे व्यंग्य की चुटकियाँ लेकर,
मैंने भी उनके हृदय पर पटक दिये अपनी मुट्ठियों के कुछ गट्ठर,
उनसे ये कहकर-"तुम बहुत दुष्ट हो कितना सताते हो!"
वो कहने लगे-"फिर भी तुम इस दुष्ट से इतना प्रेम करती हो!" 

मैं फिर मुस्कुरा दी और अपनी मुट्ठियों को खुला छोड़ दिया था मैंने,
उन्होंने भी अपने हाथों को मेरी खुली हथेलियों में समेट दिया।
मैं समर्पण भाव में निढाल सी एक पूर्ण विश्वास से भरी हुई कुछ इस तरह पड़ी थी...
मुझे विश्वास था ख़ुद पर और उन पर कि मेरी 'अस्मिता' भंग ना होगी...
और मेरा विश्वास सत्य ही था क्योंकि 'ओजस्विनी' और 'सौन्दर्य' तो एक-दूसरे से मन से प्रेम करते हैं।
      उन्हें अपनी सीमाओं का भान है,दो वर्ष दूर रह कर भी जब "ओजस्विनी" का मन विचलित ना हुआ तो भला अब कैसे होता!

अन्धकार कुछ और गहरा गया था,
रात्रि का अंतिम प्रहर भी निकट आ गया था...
अब हमने अपने शब्दों को विराम दिया..
उनके स्नेहमयी चुम्बनों ने मेरे अश्रुओं को थाम लिया..
अब उनकी हृदयगति भी पहले से मन्द थी,
वो सुकूँ से मुझे अपने आलिंगन में समेटे, मुझ पर अपना स्नेह लुटा रहे थे,

मेरे मस्तक का उनके हृदय से मिलन,
उनकी हथेलियों का मेरी हथेलियों से मिलन,
उनके चुम्बन की मेरे मस्तक,नेत्रों और ओष्ठों तक की यात्रा...
और हमारे बीच पसरा वो निःशब्द "सन्नाटा"...
फिर पुनः लौट आया था मौन की अनुभूति लेकर,
पर अब हम उस सन्नाटे को तोड़ना नहीं चाहते थे..
उसके होने पर भी हमें आनन्द की अनुभूति थी,
क्योंकि इस बार वो हमें जोड़ने आया था,
           
वो अजनबी रात अब मेरे लिए चिर-परिचित बन चुकी थी,
हम उस रात्रि के अंतिम प्रहर में कुछ यूँ बेसुध से थे कि ना तो हमें सुबह के आने का एहसास हुआ,न ही दिन चढने का,
मैं दीवार के सहारे आँखें बन्द किए बैठी थी,
आँखों में बेहोशी थी..
वो मेरी गोद में अपना सर रखकर,मुझसे लिपटे हुए थे इस तरह,जैसे उन्हें अब मेरे स्नेह की आवश्यकता थी,मैं आँखें बन्द कर उनके बालों को सहलाती रही,
रख दिया मैंने भी अपना चुम्बन उनके मस्तक पर,
पर तभी सूर्य की तेज किरण आ धमकी उस कक्ष में,
हमें भान हो आया कि दिन चढ़ गया है...

दिन की तेज़ रौशनी ने फिर से उनके पिघले हुए दिल को "खौला" दिया...
उनके दिल के "लिक्विड" का "बॉयलिंग प्वाइंट" बढ़ा दिया,
जिसे रात भर मेल्ट किया था हमने अपने स्नेह और आँसुओं से..
जिसे निकाल कर लाये थे हम "डीप फ्रोज़ेन स्टेट" से..
अब वो खौलने लगा था उबल कर..
दूर कर दिया उन्होंने ख़ुद से हमें,
कर दिया 'विदा', स्वयं से दूर कर..

मैं "उस अजनबी रात" के चन्द लम्हों को समेट कर..
चल दी फिर उसी राह पर..
जहाँ मेरी अधूरी कहानी का पूरा एहसास मेरी प्रतीक्षा कर रहा था..
मैं फिर उस अधूरे एहसास में ख़ुद को तलाश रही थी। 
    

Thursday, 19 January 2012

ओजस्विनी की कहानी (एक बार फिर...)

आज एक बार फिर मैं बैठी हूँ,
उसी फ़र्श के पास,
उन्हीं पेड़ो के साथ,
वही दीवारें, वही अमरूद का गाछ,
उसी फ़र्श के बाहर एक टीलेनुमा आकार,
ख़ुद को निहारती हो बेबस कुछ, कुछ लाचार,
कुछ-कुछ वैसी ही शाम,ये शाम का आसमाँ,
जहां कुछ देर बाद रात और दिन का मिलन होगा,
कुछ भीड़ होगी,लोगों का जमावड़ा होगा,
पर उस भीड़ के आने तक मैं यहाँ अकेली हूँ
झाँकती,निहारती,टटोलती अपनी उन यादों का दामन,
जहाँ कल मैं खेली थी।
वो हँसी यहाँ गूँजा करती थी,जहाँ हम संग थे,
चिड़ियों की आवाज़ें आज भी उतनी ही सुरीली हैं
जितनी कल थी,
वो गुलमोहर का पेड़ आज भी वैसे ही झूम रहा है,
जैसे कल था,
पर आज ये सन्नाटा जैसे मुझे चिढ़ा रहा है,
क्यूँ? क्या हुआ? कल बहुत हँसी-ठिठोली करती थी ना,
मैं कहता था मुझे सुन,
पर सुनती नहीं थी ना,
देख आज तू ख़ुद मेरी आग़ोश में चली आई है,
आज तू ख़ुद को मुझे सौंप रही है,
पर आज मैं तुझसे दूर चला जाऊँगा,
मुझे तो हलचल से प्रेम हो गया है,
चिड़ियों की,झूमते पत्तों की,झींगुर की
और इस फ़र्श पर उड़ते तिनकों की हलचल से,
जितना तुझे प्यार है इस शाम के बीते पल से,
आज तुझे मैं रूलाना चाहता हूँ,
तन्हाई का दर्द बताना चाहता हूँ,
इसलिए तेरा तिरस्कार कर रहा हूँ,
तेरे ह्रदय पर अपना ये प्रहार कर रहा हूँ।
तब तू समझेगी मैं क्या कहता था,
अपनी ख़ामोशी से तेरा दिल बहलाता था,
और ख़ुद अकेले में कितने आँसू बहाता था,
जा,तू फिर उसी भीड़ के पास जा,
जहाँ तेरा दिल ना लगे,
तू मुझे याद करना भी चाहेगी तो लौट कर ना आ सकेगी,
चाह कर भी उस भीड़ में किसी को अपना ना सकेगी.
और फिर,
वो सन्नाटा जाने लगा मुझसे कहीं दूर,
मैं उसे जाते हुए देख रही थी,
हो कर के मजबूर,
उसी फ़र्श के पास,
उस टीले पर बैठी,
उन्हीं पेड़ों के नीचे,
उसी हवा के साथ,
बैठी वहीं उदास।।   
16 अगस्त 2010
समय- शाम 6.30 बजे
सुन्दरम् ओझा
लख़नऊ.

Wednesday, 26 October 2011

ओजस्विनी की कहानी (भाग-२)

मित्रों आज दीपावली है...सारा संसार खुशियाँ मना रहा है. जहाँ भी हमारे भारतीय जन प्रसृत हैं वहां दीपों की छठा  दर्शनीय है.,परन्तु आज भी क्या ओजस्विनी खुश है???? जिसके नाम में ही असीमित प्रकाश समाया हुआ है वो आज भी विचलित क्यों हैं? क्या ओजस्विनी इस दीपोत्सव में स्वयं को प्रकाशमान पा रही है ? इससे पहले मैंने आपको ओजस्विनी के मित्र -प्रेम की कथा के  एक अंश से परिचित कराया था आज उसकी कहानी का एक और अंश प्रस्तुत है आपके समक्ष .यदि आप उसके पहले के जीवन से रूबरू होने के इक्षुक हों तो आदेश करियेगा.मैं आपके समक्ष उन अंशों का भी वर्णन करुँगी   .आएये जानते हैं आज की  उसकी मनोदशा उसकी ही ज़बानी...


                                                         ओजस्विनी  और  दीपोत्सव 

आज हूँ विह्वल , आज हूँ व्याकुल ,
जग सारा है उज्ज्वल -उज्जवल,
दीपों की है छठा निराली,
सबकी जगमग है दिवाली,
जीवन से सबके तम हरने,
आई है समृद्धि, खुशहाली , 
ओज हूँ मैं,तेज हूँ मैं,
पर फिर क्यूँ निस्तेज हूँ मैं?
मेरी व्याकुलता का रहस्य क्या.. 
कोई बता दे क्यूँ मैं विस्मृत हूँ?
क्या सच में सब मंगलमय है?
क्या सबके  जीवन में अरुणोदय है?
कहीं कोई पैसों से खेले,कहीं किसी को मिलती गाली..
कैसी है ये दिवाली?
देश मेरा क्यूं भ्रष्ट हो रहा?
प्राण मेरा निस्तेज हो रहा...
कहाँ प्रणय-सौंदर्य है मेरा?
 आज मेरा क्यूँ ह्रदय रो रहा?
पंछी  की कुंजन भी काली..
दिखती नहीं चहक की लाली, 
ये कैसी है कहो दिवाली?
मेरा प्रियतम पूछे न मुझको....
वैसे तुम सब भूले मुझको..
अब मुझको तम ही तम दिखता.
महंगाई ने जान निकाली...
सड़कों पर सोई हूँ मैं.. 
न है ज़मीन पैरों तले ,
न है सर पे छत  की थाली ..
तुम्ही कहो सौंदर्य -प्रणय..
तुम बिन कैसे हो दिवाली?
मिटटी  के दीपक सूने हैं..
बिन बाती ,बिन घी के खाली...
तुम्ही कहो सौंदर्य-प्रणय मेरे..
तुम बिन कैसे हो दिवाली?
मैं  बैठी हूँ इसी प्रतीक्षा में,
तुम आओगे तम हरने को ,
मुझमे नव साहस  भरने को ... 
चूम लोगे मस्तक को मेरे,
कर लोगे आलिंगन  मेरा..
हर लोगे हर विकृति  को मेरी..
मेरे आँचल का हर प्राणी जब खुश होगा ,
देश में जब होगी खुशहाली ...
तब होगा मेरा दीपोत्सव
गर्व से कहूँगी मैं ,
मैं  तेरी ओजस्विनी हूँ!!!


Monday, 24 October 2011

"ओजस्विनी" की कहानी

दोस्तों आज जिस "ओजस्विनी" की कहानी मै आप सबको सुनाने जा रही हूँ  उसका जन्म आज से दो वर्ष पहले मेरी कल्पनाओं में हुआ. वो न जाने कब से उदास थी,जैसे कुछ खो दिया था उसने ....लेकिन खोकर भी पाने का एहसास उससे बेहतर कोई नहीं जनता था. उसने अपनी पिछली जिंदगी को "अधूरी कहानी..... एक पूरा एहसास"  कहा है,पर आज मै उस अधूरी कहानी की बात नहीं करूंगी क्योंकि आज मै ओजस्विनी के उल्लास का वर्णन करना चाहती हूँ.
                       तवारीख़ २० अगस्त २०१०,दिन शुक्रवार ...अरे आज तो जुम्मे का दिन है....एक पाक़ दिन और आज इस नेक की दुआ कुबूल हो गई हो जैसे. आज वो बहुत खुश है..क्यों???? आएये उसी की ज़बानी सुन लेते हैं......

                                                       " ओजस्विनी एक बंदिनी "


आज मै बहुत खुश हूँ,तुम्हें पाकर  अपने पास,
वहीँ जहाँ कल बैठी थी तेरी प्रतीक्षा में,
अनवरत मैं उदास ,
तेरी राह जोहती,
बाट निहारती , ख़ुद का करती उपहास,
मिल "सन्नाटे" के साथ !
मैं तेरी ओजस्विनी हूँ!
आज मै बहुत खुश हूँ , तुम्हें पाकर अपने पास.....
तुम्हें देख पाने की उम्मीद धुंधली  पड़  चुकी थी,
मेरी आँखें भी आंसुओं से सूनी  पड़  चुकी थी...
पर रह-रह कर एकत्रित जल नेत्रों से गिर पड़ता था,
जैसे नल की टोंटी में बचा हुआ पानी,
जो कहता था खाली टंकी  की कहानी.
नेत्रों में स्वाभाविक काजल नज़र आता था ,
जो जागती रातों की कहानी सुनाता था,
तेरे न आने तक मैं सब पे बिगडती थी, 
ख़ुद पर खीझती और चिल्लाती थी ,
पर आज मानो  अचानक मेरे ह्रदय ने,
तेरे दूर पड़ते क़दमों की आहट सुन ली थी ,
और थके हुए चेहरे पर मुस्कुराहट ने जगह ली थी,
ज्यों ही मैं निकली एक कक्ष से बाहर, 
तू  मुझसे  टकराया,
और मेरे नेत्रों की टोंटी का जल पलकों के पात्र  तक उमड़ आया,
पर मेरे अधरों पर एक स्वछंद हंसी तैर रही थी ,
शब्द अन्दर ही अन्दर सिमट जाना चाहते थे. 
उस क्षण मैंने कब अनजाने ही तेरा हाथ थाम  लिया,
तुझे किसी से मिलने भी न दिया,
बस जी चाहता था की  इस पल में कोई दखल न दे, हमें चंद लम्हों के लिए अकेला कर दे,
मै तुझसे कुछ न कहूँ और तू मेरी ख़ामोशी को पढ़ ले ,तूने  मेरे शब्दों के उतावलेपन को देखा था,
ऐसा जान पड़ता था मानो लबालब भरा कोई पात्र था,जो ख़ुद को तुम पर उडेलना चाहता था ,
                              अवसर पाकर एक नवागंतुक मित्र को हम राह दिखाने चले थे,
                               लौटती सड़क पर हमें कुछ पल अपने मिले थे ,
                               जहाँ मैं तुम्हें सुन रही थी ,तेरे साथ चल रही थी ,
                               कुछ मैं भी कह रही थी और राह थम गई ,
                               हम चंद पलों में फिर उस कक्ष में थे ,
                               जहाँ कुछ क्षण पहले मै थी,सब थे,
                                पर अब तुम भी थे.
मेरी ख़ुशी आज सबने देखी  थी,
थकी आँखों की चमक, मेरे शब्दों में चहक,
 आज सबने सुनी थी , 
ऐसा लगता था जो कली  दो दिन पहले मुरझा गई थी,
उसे आज शायद नयी जिंदगी  मिली थी...
वो कुछ खिली -खिली  थी ,
कुछ और वक़्त तेरे साथ बिता पाती ,
यही सोच कर आज तेरे संग चली थी ,
उस दिन संध्या के अंतिम प्रहर में ,रात्रि के चढ़ते शिखर में,
हमने चाय के नुक्कड़ की तलाश की ,
कई सड़कों -चौराहों की खाक छानती,
अंत में एक जगह मिली,
जहाँ न शोर था,न ही "सन्नाटा",
                                          आज वहां बस हलचल थी,
                                          सन्नाटे की वो प्रेमिका,
                                          आज हम दो दोस्तों के बीच चली आई थी,
                                          हम चाय के पात्र हाथों में थामे अपनी बातें सुना रहे थे,
                                           कुछ नगमें  जो अनसुने थे ,                                                                           
                                           जल्दी में गा रहे थे ,
                                           चंद लम्हों में महीनो की बातें समेट  देना चाहते थे,
                                            पर तुम न जाने क्यूँ,आज भी कतरा रहे थे,
                                             तुम्हारी नज़रें जैसे ख़ुद को दोषी मान रही थी ,
                                             पर नहीं मित्र ,दोषी न तुम थे,न हम थे,
                                                 दोषी तो वो भाग्य है ,जिसने मेरे मन में तुम्हारे  लिए प्रेम भर दिया था,
ये जानकर भी की तुम मेरे नहीं हो सकोगे,
शायद वो तुम्हारी  इस "ओजस्विनी " से ईर्ष्या  की  भावना रखता था ,
पर वो शायद नहीं जानता था की "ओज" अपने "सौंदर्य" को पा लेगी ,  
प्रेम के कई रूप हैं ,मित्र-प्रेम एक चरम प्रेम है,
जिसकी बंदिनी ओजस्विनी बन चुकी थी ,
आज सौंदर्य ने उसे जीवन पर्यंत अपनी मित्रता की बंदिनी  बना लिया था ,
जहाँ केवल मानसिक,हार्दिक,मानवीय, पवित्र -प्रेम था .
                                                जहाँ विचारों का प्रेम था,भावनाओं का बंधन था,
                                                 जहाँ लेशमात्र भी भौतिकता न थी ,
                                                 जहाँ बस मधुर स्मृतियों का आलिंगन था ,
                                                  मैं "ओजस्विनी" अपने "सौंदर्य " को निहार रही थी ,
                                                  जिसे कभी मैंने प्रेयसी बन प्रेम किया था अपनी भावनाओं से,
अपेक्षित समयावधि से अधिक संग मिल चुका  था तुम्हारा ,
मुझे तो बस इन स्मृतियों का ही है सहारा,
आज मै बहुत खुश हूँ ,तुम्हें पाकर अपने पास ,
शायद यही हो मेरे जीवन का किनारा ,
जहाँ तुम हो मेरे पास,
स्मृतियों के साथ ,स्मृतियों के साथ.