जिस धरती पे हम जन्में हैं...जहाँ धर्म सभी मिल रहते हैं...
हिन्दू,मुस्लिम,सिख, ईसाई,आपस में सब भाई भाई..दिन रात गीत ये गाते हैं..
गर्व करते हैं इस बात पर कि हम,धर्मनिरपेक्ष (secular ) राष्ट्र में रहते हैं.....
पर जब सोचा मैंने, कि क्यों न मैं इश्क को अपना मज़हब बना लूँ.....
तभी एक आवाज़ आई कि तुम प्यार करने कि भूल मत करना...
ख़ानदान की इज्ज़त रखना,माँ-बाप कि लाज रखना....
जिस जाति में जन्मी हो उसमें ही ग़र हो जाये इश्क नसीब तो कहना...
हम रिश्ते की सोचेंगे.....इसलिए अब तक न प्यार कर पायी न ही खुल कर इज़हार कर पाई...
जिसे चाहा होकर दीवानी मीरा की तरह...उसे अपना श्याम न कह पाई.....
क्या जाकर गली गली ये पूछूँ हर शख्स से कि वो किस जाति का है?....किस गोत्र का है.?
किस कुल का है? फिर कहूँ उससे कि क्या वो मुझे प्रेम कर सकता है?
फिर वो कहे कि दहेज़ की रकम क्या होगी?
ग़र न चुका सकूँ उसके प्रेम की कीमत तो फिर चल पडूँ एक नयी तलाश में...
अपनी आत्मा किसी और को चाहती रहे जीवन भर..
फिर भी हम ख़ानदान कि इज्ज़त रखने को भटकते रहें अपने शरीर का सौदा करने..
कि कर ले कोई प्रेम मुझसे भी..क्या खानदानी होने की निशानी का पता इस जाति- बंधन में भटकते हुए
अपनी नीलामी की बोली के इंतज़ार से ही चलता है ..?
पर उस पवित्र रिश्ते का क्या जिसे एक बार में ही आत्मा ने बिना किसी मोह या प्रलोभन स्वीकार कर लिया हो..?
भारत में आज भी जहाँ खाप पंचायतें इश्क के मज़हब पर सजा-ऐ-मौत सुनती हैं...
उस देश की जनता सेकुलर होने का बिगुल बजाती है....
इस देश में इश्क का मज़हब नीलामी और सौदा है....
यहाँ तब तक भटकना है हमें,जब तक इस शरीर की बोली लगा कर इसे अपनी ही जाति में बेच न दिया जाये...
जब तक रूह का कत्ल-ऐ-आम न हो जाये....जब तक इस सेकुलर देश में इश्क का मज़हब न बन जाये .
"सुन्दरम"
जिंदगी आप की है...किसी और की नहीं...तो यह आपका अधिकार होना चाहिए कि आप इसे कैसे और किसके साथ जीना चाहते हैं। समाज हमने यानी लोगों ने बनाया था पर अब यह हम पर ही हावी हो रहा है क्योंकि लोगों ने इस संस्था का सहारा लेकर अपनी चलानी चाही पर अब सामाजिक परिस्थितियां बदल रही हैं....मेरा मानना यह है कि अगर आप अपनी बात अपनों को नहीं समझा सकते तो गैरों को कैसे समझाएंगे...so go ahead... दुनिया बहुत खूबसूरत है और इसे और बेहतर बनाना हमारी जिम्मेदारी है....
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