Friday, 20 February 2015

मन की फिरौती


कैसी ये अजब चुनौती है,
ख़ुद से ख़ुद की,
व्याकुल मन की,
ये कैसी एक फिरौती है,
जिस मोड़ को छोड़ बढ़े आगे,
जिस डोर से रिश्ता तोड़ लिया,
जब व्याकुल मन की पेंग बढ़ी,
फिर उनसे रिश्ता जोड़ लिया,
जल के भीतर भी चैन न था,
जल के बाहर ना साँस मिले,
भीतर- बाहर, बाहर-भीतर
इक पग ऊपर, पर फिर से अधर,
न जाने साहसी जीवन को है,
किसकी प्रतीक्षा और किसका डर,
ये मन की चाल न जाने, किसके घर की बपौती है !
ये कैसी अजब चुनौती है ।
ख़ुद से ख़ुद की,
व्याकुल मन की,
ये कैसी एक फिरौती है ।


Saturday, 17 January 2015

उम्मीद की धुंधली किरण


कल शाम एक रेस्ट्रां में दो सहेलियाँ बात कर रही थीं। उनमें से एक लख़नऊ से थी और दूसरी दिल्ली से आई थी। लख़नऊ वाली ने पूछा – दिल्ली के क्या हाल हैं ?”  तो दिल्ली वाली बोली – हाल तो बढ़िया हैं, हम दिल्ली वाली लड़कियाँ आज भी स्ट्रेटनिंग कराने में काफी आगे हैं। हमारे स्टाईल और मेकअप के आगे कोई कहाँ टिकने वाला है।” 

इतने पर ही बात काटते हुए लख़नऊ वाली ने कहा – अरे ये सब तो ठीक है पर मौसम का मिज़ाज कैसा है तो वो बोली- यू नो, इट्स टू कोल्ड, लेकिन पॉलिटिकल गहमा-गहमी है।पहली वाली ने कहा–ज़रा खुल के बताओ तो दिल्ली वाली बोली – वो कोई किरण जी ने पॉलिटिक्स ज्वॉइन कर लिया है और लोग कह रहे हैं कि अच्छे दिन लाने में अब वो भी अपना कॉन्ट्रिब्यूशन देंगी।

इतना सुनते ही ये लख़नऊ वाली ख़ुशी के मारे तपाक से बोली –किरण जी, तुम्हारा मतलब मेरी आदर्श किरण जी ! 
दिल्ली वाली लड़की-ओएमजी ! ये एक रिएलिटी शो की जज के नाम पर तुम इतनी ख़ुश क्यों हो रही हो ? इसमें ऐसा भी क्या है

जवाब में लख़नऊ वाली लड़की बोली- अरे यार, अजीब हो, रिएलिटी शो की जज किरण जी तो बहुत पहले से राजनीति में हैं। लगता है तुम्हें अधूरी न्यूज़ पता है । ये तो वो किरण जी होंगी जो मेरी आदर्श हैं। मैं वो लड़की हूँ जो हर उस महिला की शुक्रगुज़ार है जिसने महिलाओं के लिए नये रास्ते खोले । पहली आईपीएस, पहली पर्वतारोही, क्रिकेट टीम की पहली महिला कप्तान, पहली महिला बॉक्सर, और पहली अमुक फलाँ...फलाँ.....। हर लड़की ने अपनी- अपनी रूचि के हिसाब से अपने आदर्श चुन लिए , लेकिन जिन लड़कियों का आईपीएस सेवा से कोई लेना देना नहीं था वो भी किरण जी को आदर्श मानती हैं। लेकिन मुझे उनके एक फ़ैसले पर अफ़सोस हुआ था जब उन्होंने चेहरे से मार्क्समिटाने वाली एक क्रीम का विज्ञापन किया था । उस वक़्त मैंने यही सोचा था कि ऐसी कौन से मजबूरी थी जिसने ऐसे उच्च आदर्शों वाली महिला को एक क्रीम का विज्ञापन करने पर विवश कर दिया था ।

दिल्ली वाली- ओहो, आई गॉट इट , बट ट्रुली स्पीकिंग यार उस क्रीम से तो मेरे चेहरे के मार्क्स, नो – मार्क्स में बदले ही नहीं...तेरी आइडियल ने भी झूठा वादा किया ना । ये सारे पॉलिटिशियन्स होते ही ऐसे हैं ।

लख़नऊ वाली – महोदया आपको कुछ पता भी है, मेरी किरण जी बहुत ईमानदार हैं , कभी बेईमानी नहीं की उन्होंने ।
दिल्ली वाली – क्या वो हमारे झाड़ू और धरना ट्रेंड सेटर से भी ज़्यादा ऑनेस्ट हैं ?
लख़नऊ वाली- जी हाँ,और तुम्हारे धरना कुमार के साथ हर क़दम पर खड़ी थीं हमारी किरण जी।
दिल्ली वाली(इस बार तंज कसते हुए) - अच्छा.... काफी दिन से साथ में ऐसी कोई उम्मीद की किरण दिखी नहीं ।
लख़नऊ वाली-(सोचते हुए..)- वो.....वो....वो तुम्हीं ने तो कहा कि अब वो अच्छे दिन लाने में कॉन्ट्रीब्यूशन देंगी ।
दिल्ली वाली – अच्छा हाँ, याद आया, मैं तो भूल ही गई थी । यस,यस यू आर राइट ।

(लेकिन इस पल में ही लख़नऊ वाली इस लड़की के मन में कुछ खटक सा गया और उसके बाद उसका लहज़ा बदलता चला गया ।)

लख़नऊ वाली- यार देखो, किरण जी चाहे आदर्शवादी और तुम्हारे ट्रेंड सेटर धरना कुमार के साथ खड़ी हों या फिर अच्छे दिन लाने की जुगत में....... कम से कम दोनों ही सूरतों में दिल्ली वालों के दोनों हाथों में लड्डू हैं । क्योंकि ईमानदार तुम्हारा धरना कुमार भी है और मेरी आदर्श किरण जी भी । कम से कम ख़ुशी मनाओ इस बात की , कि अगर वो इन चुनावों में खड़ी होती हैं तो दिल्ली एक बार फिर इतिहास दोहराएगी , बेहतर विकल्पों में टक्कर का इतिहास ।

दिल्ली वाली - यार दिल्ली की पब्लिक धरना कुमार से प्यार तो बहुत करती है लेकिन वोट............मुश्क़िल है । पर मुझे केजू से बड़ी हमदर्दी है। अकेले ही उसने सबकी हवा टाइट कर दी थी । राजस्थान की चीफ मिनिस्टर भी ट्रेंड फॉलो करने लगी थीं, ट्रैफिक़ सिग्नल पर वीआईपी गाड़ियाँ रूकने लगी थीं । बड़े- बड़े मंत्री गाँधी-गाँधी चिल्लाने लगे थे , लेकिन ग़लती केजू की ही है , उसे राजनीति का एक्सपीरिएन्स नहीं था ना , इसलिए उसने दिल्ली की जनता के प्यार और विश्वास में पूरे देश के प्यार और विश्वास की उम्मीद लगा ली.....उसे लगा शायद पूरा देश उसे पसंद करता है ...और फिर दिल्ली तो उसकी अपनी है, उस पर फिर भरोसा कर लेगी और ये सोच कर मेरे केजू ने दिल्ली की कुर्सी का मोह त्याग दिया। कोई और होता तो एक गद्दी तब तक ना छोड़ता जब तक उसे दूसरी नई और बड़ी गद्दी ना मिल जाये । बस यहीं ग़लती हो गई मेरे केजू से......नादान था ना ......जबकि मोटा भाई को ही ले लो...उन्होंने पहले जाल बिछाया...बड़ी कुर्सी का इंतज़ाम किया और उसके बाद छोटी कुर्सी पर अपनी पसंद के मोहरे को बिठा दिया ...और क्या पता इस बार दिल्ली इलेक्शन्स में एक और मोहरा उस बड़ी कुर्सी की ताकतों को कॉन्ट्रीब्यूशन दे दे । काश ! तेरी किरण जी ने मेरे केजू का साथ दिया होता तो शायद आज मेरे केजू की हालत कुछ और होती पर क्या करें आख़िर तेरी किरण जी हैं तो इंसान ही...कुछ एम्बिशंस तो उनकी भी होंगी ना। तेरी किरण जी की असली परीक्षा तो अब होगी कि वो अपनी ज़िन्दगी भर की ईमानदारी की  जमापूँजी को ख़र्च करेंगी और उससे दिल्ली को ख़रीदने की कोशिश की जा सकती है ।

(लख़नऊ वाली लड़की की आंखे फटी की फटी रह गईं कि आख़िर ये दिल्ली वाली फैशनपरस्त लड़की ने इतना सोच कैसे लिया । उसके दिमाग़ में घंटियाँ बजने लगीं। फिर उसने थोड़ा दिमाग़ दौड़ाया और सोचा कि अपनी किरण जी को सही कैसे साबित करे और फिर इस निष्कर्ष पर पहुँची ।)

लख़नऊ वाली लड़की- यार देख, मेरी किरण जी की ईमानदारी पर तो किसी को भी शक़ नहीं है तो अगर उनकी सेना रामसेना निकली तो वो हनुमान की भूमिका में जनता और जनता के सेवक राम की सहायक कहलायेंगी और यदि उनकी सेना रावणसेना निकली तो वो विभीषण की भूमिका में होंगी और अच्छाई का साथ किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगी, और इस तरह उम्मीद  की किरण को धुंधली नहीं पड़ने देंगी ।

(ये पूरा वाक़या देखते सुनते मैं 2 कप कॉफी ख़त्म कर चुकी थी । भला हो उस कॉफी का जिसने मुझे बिठाये रखा और उन्हें लगाए रखा ।)

डिस्कलेमर- धार्मिक नामों का उल्लेख प्रतीकों के रूप में किया गया है। किसी की भी धार्मिक भावनाएं आहत करने की लेखक की मंशा नहीं है ।) 

Sunday, 11 January 2015

वसुधैव कुटुम्बकम्

देखिए वाइब्रेंट गुजरात सम्मिट चल रहा है । आज से 3 दिन तक चलेगा और इसकी शुरूआत होते ही माननीय प्रधानमंत्री जी ने  वसुधैव कुटुम्बकम् की विचारधारा विश्व के समक्ष रख दी है । वो वहाँ सबका साथ, सबका विकास के नारे दे रहे हैं। अब वो लोग जो ख़ुद को सेक्युलर नहीं मानते पर स्वयं को प्रधानमंत्री का परमभक्त कहते हैं , उन्हें साष्टांग प्रणाम करते हैं । जिन्हें हिन्दुत्व के अतिरिक्त अन्य सभी धर्म एक षड्यंत्र नज़र आते हैं, वो भला कैसे सबका साथ , सबका विकास मानेंगे ? कहीं सबका साथ देते देते किसी अमुक धर्म ने अपने परिवार की संख्या बढ़ा ली तो ?  तो फिर उन परमभक्तों के घर की महिलाओं को भी कम से कम चार बच्चे पैदा करने वाली मशीन बनना होगा । यदि ये न हो सका तो सारे कार्य छोड़कर सबको घरवापसी कराने का काम करना होगा ।

ज़रा सोचिए एक परिवार में क्या होता है जब एक भाई दूसरे से ज़्यादा तरक्की करने लगता है, तो ईर्ष्या और द्वेष जन्म लेते हैं , फिर उस प्रतिस्पर्धा में दूसरा भाई भी मेहनत करता है और इस तरह होता है विकास । जब तक प्रतिस्पर्धा नहीं होगी, विकास कैसे होगा और इस प्रकार की प्रतिस्पर्धा को जन्म देने के लिए ये भी आवश्यक है कि सम्पूर्ण विश्व को अपना परिवार मान लिया जाये । परिवार वैसे तो समाज की प्राथमिक ईकाई है और एक परिवार , कभी अपने पड़ोसी परिवार की तरक्क़ी से ख़ुश हो ही नहीं सकता जब तक पड़ोसी परिवार की तरक्क़ी से उस प्राथमिक परिवार को कोई लाभ ना हो रहा हो । यदि पड़ोस वाले की तरक्क़ी से अपने चार काम बनते हैं तो हम भी रोआब झाड़ लेंगे । हमसे बहस नहीं एसीपी फलाँ हमारे पड़ोसी, हमारे अच्छे दोस्त हैं, अक़्ल ठिकाने लगवा देंगे ,समझे  

वैसे 7 से 9 जनवरी तक गुजरात में  प्रवासी भारतीस दिवस का आयोजन हुआ और प्रवासियों को निवेश के लिए आकर्षित करने के मक़सद से उत्तर-प्रदेश सरकार ने भी एअर पोर्ट से योजनास्थल तक  यू. पी. राइज़िंग के पोस्टर लगवाये थे , जिसमें उत्तर –प्रदेश में पनप रही संभावनाओं का ज़िक्र था लेकिन सम्मिट शुरू होने से पहले ही गुजरात सरकार ने उन पोस्टर्स को उतरवा दिया । गुजरात सरकार इसे अवैधानिक बता रही है जबकि उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि वो इस आयोजन में बराबर के हिस्सेदार हैं इसलिए उन्हें अपना प्रचार करने का अधिकार है और साथ ही यू.पी. सरकार का कहना है कि सारी कार्यवाही पूरी होने और गुजरात नगर निगम से अनुमति लेकर ही ये पोस्टर्स लगवाये गये थे । उत्तर –प्रदेश के मुख्यमंत्री वैसे तो ख़राब मौसम के चलते इस सम्मिट में शामिल नहीं हुये पर शायद ये भी संभव है कि इस घटना से उनके मिज़ाज का मौसम बिगड़ गया हो । हम कहते हैं चलिये अगर वो पोस्टर वैधानिक नहीं भी थे तो भी गुजरात सरकार दो दिन की अवैधानिकता ही सह लेती, सम्मिट के बाद पोस्टर हटवा लेते , लेकिन नहीं, प्रवासी निवेशकों को भला दूसरे राज्य की तरफ़ आकर्षित कैसे होने देते ! अभी कोई गैंगरेप या मार-पीट की ख़बर होती तो यूपी को सबसे आगे खड़ा कर देते । यही तो है वसुधैव कुटुम्बकम् का आरम्भ , हर बात की शुरूआत अपने घर से ही तो होती है।परिवार का एक सदस्य दूसरे की तरक्क़ी कैसे देख सकता है । आशा करते हैं,वाइब्रेंट गुजरात सम्मिट पूरा होने के बाद घर वालों को भी ये सीख दी जायेगी कि वास्तव में वसुधैव कुटुम्बकम् का अर्थ है क्या।अभी तो मेहमान घर आये हुए हैं तो ज़रा अतिथि देवो भवः की परम्परा निपटा ली जाये, फिर आपस में भी निपट लेंगे ।

Friday, 19 December 2014

रौशनी

घुटन हो रही है....
जलन हो रही है.....उस वाक़ये के घटने से पहले से ही चुभन सी हो रही है...
ना पता था कि इतना कुछ यूँ ही घट जायेगा....कि एक पल में मुझे उस घुटन का अंजाम नज़र आयेगा....
बुरे ख़्वाब से भी बुरी है ये हकीक़त......जैसे उजड़ ही गई है दुनिया-ए-अक़ीदत...
कभी ये भी ख़्याल नहीं आता कि बुरे ख़्वाब में भी ऐसा मंज़र नज़र आये....
कि नन्हें इन्सानी फ़रिश्तों का लहू , हैवान बहाये......
अगर सच में तुमने अपनी नन्हीं जानों के दर्द को जिया होता.....
तो तुम आज बदले की शमाँ न जलाते....लहू के बदले लहू न बहाते..... 
बहाना ही था तो अपनी हैवानियत को गहरे दरिया में बहाते...
अमन की रौशनी की एक लौ तुम ही जलाते....... 
तुम्हारे किए की सज़ा तुम्हारे मासूमों को मिली थी ऐ तालिबान...
क्यों अपने मासूमों को बना रहे थे तुम आने वाले कल का शैतान.......
मानते हैं कि दर्द तुमने भी जिया होगा....
पर तुमने कौन सा अपने उन मासूमों की क़िस्मत में उजले कल की रौशनी लिखी थी......
तुम उन्हें भी हैवान ही बनाते...अपने झूठे मक़सद की बलि उनको भी चढ़ाते......
उनके मन में हैवानियत का ज़हर भरते......उनके लिए आने वाले कल में भी एक बुरी मौत मुक़र्रर करते.........
अगर उन मासूमों के दर्द की इतनी ही परवाह होती तो तुम तालिबान ही क्यों बनाते ? 
न अपने लिए, ना ही औरों के लिए क्यूँ शमशान बनाते........ 
तुम्हारे करम ऐसे भी नहीं थे कि तुम्हारे मासूमों के ज़नाज़े पर रोई हो दुनिया.......
देखो जिन्हें तुमने उजाड़ा है, उस पर कैसा सहमा,उबला, ख़ौला है ये जहाँ......
बस करो, बंद करो यूँ बंदूकों के पटाखे जलाना....यूँ लहू के रंग बहाना......
इस ज़िन्दगी में तो तुम्हारे मन के अंधियारों में कोई दिया जल ना पायेगा.......

तड़पती रूहों की बद्दुआ का ज़हर तुम्हें निगल ही जायेगा.....
इससे अच्छा है कि तुम लानत से ख़ुद ही मिट जाओ....
कम से कम एहसास-ए-ग़ुनाह से तुम्हारी रूह को सुकूँ तो मिले........
शायद इसी एहसास से आने वाले कल में रौशनी की एक शमाँ तो जले.......


Saturday, 8 November 2014

युगमानव


मिसाल क़ायम करने के लिए कुछ दर्द उठाने पड़ते हैं,
नई राह औरों को देने के लिए , पग अपने जलाने पड़ते हैं,
नये पंख किसी को देने के लिए, पर अपने फैलाने पड़ते हैं....
दांव पर लगाने पड़ते हैं , करने होते हैं कई विरोध,
सहने पड़ते हैं अनेकों प्रतिरोध,
पर हिम्मत, ग़र यूँ तुम हार गये , तो सिर्फ़ नहीं हो तुम हारे...
तुम जैसे कई नवोदित पंक्षी, रूक जायेंगे राहों में.....
पर तुमने अपनी बाधाओं पर , ग़र विजय पताका लहरा दी ,
तो विजय तुम्हारी नहीं , कोटि-कोटि आशाओं की होगी,
नये प्रयासों की होगी, जो रच देगी एक नया इतिहास..
इसलिए कहती हूँ, बन युग-मानव (पुरूष,स्त्री अथवा अन्य अर्थात सभी मनुष्य),
अश्रु तेरे यूँ व्यर्थ नहीं......भावुक होना तो उचित सही, पर रूक जाने का अर्थ नहीं....
दु:ख तो तेरे क्षण भर के हैं, पर जीवन का उद्देश्य नहीं,
चल उठ,तज दे तेरे मन का ये अंतरद्वंद....फिर से कर प्रयास और जीत ले अपने भय अनंत..
ना बेड़ी तुझको बाँध सके,ना पिंजरे में होना तू बंद......देख सलाखें उन क़ैदों की....जिनमें है आज़ादी की चाभी......कर प्रयास और खोल के पिंजरा....तू उड़ जा.....फिर तेरा है सारा आकाश......तब तू कहलायेगा हे युग-मानव.....इस सृष्टि का नवप्रकाश ।। - सुन्दरम
(@Copyright reserved)

अभी बात बाकी है......(भाग-1)

बेटी- माँ, ये कैसी खिचड़ी बनाई है ... जमी हुई, अजीब सी । थोड़ी पतली होनी थी ना ।
माँ- (नाराज़ होते हुए ) तो तुम ख़ुद क्यों नहीं बना लेतीं ? 
बेटी- माँ आप पिछले 26-27 सालों से सुबह-शाम, दोनों वक़्त खाना बनाती हैं फ़िर भी आप खिचड़ी ढंग से नहीं बना पातीं , तो मुझसे कैसे उम्मीद कर सकती हैं कि मैं सब सही बना लूँगी ।
माँ-(और भड़कते हुए) तो खाने में कमी क्यों निकालती हो ?
बेटी- अगर मेरी जगह भाई ने आपसे कहा होता कि खाना ठीक नहीं बना तो आप चुपचाप सुन लेती , उसे जवाब न देतीं तो मुझे क्यों डाँट रही हैं ?
माँ – (ज़ोर से चिल्लाते हुए)- जहाँ जाओगी, लात खाओगी, क्या ससुराल में भी ऐसे ही जुबाँ लड़ाओगी ? जाओ मैं तुम्हारी शादी ही नहीं करूँगी...या तो तुम घर से भाग जाओगी या मर जाना ऐसे ही ।
बेटी- क्यों माँ अगर किसी लड़की की रूचि खाना बनाने में नहीं है तो उसे मजबूर क्यों किया जाता है , लड़के को तो कोई मजबूर नहीं करता ।
माँ- लड़के तो सड़क पे खड़े होकर मूत सकते हैं, क्या तुम ऐसा कर सकती हो ? बड़ी आई लड़कों की बराबरी करने वाली, जाओ लड़ो दुनिया से, जो-जो लड़के करेंगे, वो कर सकती हो , तो जाओ जा के सड़क पे मूतो .....।
बेटी-(बराबर स्वर में) माँ, लड़के भी तो बच्चे पैदा नहीं कर सकते ।
माँ-(झल्लाते हुए) तो , तुम क्यों उनकी बराबरी करने पर तुली हो ?
बेटी- माँ लड़के ऐसा करके कोई मर्दानगी का काम नहीं करते और उन्हें सड़क पर इस तरह खुले आम मूतने का अधिकार इस समाज ने ही दिया है । जब आप औरत होकर औरत की गरिमा को इस तरह के तर्कों से दबायेंगी तो पुरूष हमेशा सड़कों पर ऐसा करते पाये जायेंगे , क्योंकि उन्हें ये अधिकार हमारी सहनशीलता ने दिया है, हमारे सर झुका कर निकल जाने की आदत ने दिया है ।
माँ- तो तुम समाज बदलोगी ।
बेटी- हाँ , बदल भले ना सकूँ, पर सोच में बदलाव की शुरूआत ज़रूर करूँगी । जानती हूँ वक्त लगेगा, पर एक दिन दोनों (स्त्री –पुरूष) समपट अवश्य आयेंगे ।
(माँ चुप रहकर , झल्लाहट में बरतन समेटती हुई चली जाती है और बेटी फिर अपनी पढ़ाई में जुट जाती है।)
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(शिक्षा- यदि आप स्त्री हैं और इस ब्लॉग पोस्ट को पढ़ रही हैं तो भविष्य में अपने बच्चों (लड़का हो या लड़की) को लज्जा जैसे आभूषण की सीख बराबर मात्रा में दीजिए , सड़क पर लघु शंका करने का अधिकार पुरूषों ने ख़ुद ही ले लिया था, उन्हें किसी ने दिया नहीं था । महिला होकर महिला अस्मिता के साथ न खेंले ।
यदि आप पुरूष हैं और आपके मन में सड़क पर कहीं भी पैंट की चेन खोलकर खड़े होने का विचार आये तो एक बार शर्मिन्दगी ज़रूर महसूस कीजियेगा ताकि आपकी इस करतूत की वजह से कोई माँ , अपनी बेटी के सामने आपकी इस मर्दानगी का बखान न करे । पुरूषत्व महिलाओं को हराकर सिद्ध नहीं किया जा सकता।
सबसे अहम बात स्त्री हो या पुरूष , एक दूसरे का बराबर सम्मान करना सीखीए । )

Sunday, 20 July 2014

हमारा नेता कैसा हो...(भाग-3)


(एक संस्मरण)

कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो आई हैं- बारहवीं कक्षा में पहली बार मुझे किसी वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर मिला था । मंच बड़ा था- लख़नऊ का औद्योगिक विषविज्ञान अनुसंधान केन्द्र (ITRC- Formerly known as CDRI)  जहां लख़नऊ के मंहगे और नामी विद्यालयों को निमंत्रण मिला था और सौभाग्यवश हमारे विद्यालय को भी । शहर के उन बड़े विद्यालयों के सामने ना तो हम कभी खड़े हुए थे, न ही अवसर मिला था । प्रतियोगिता में विषय-वस्तु की समयावधि भी कम न थी – पूरे 10 मिनट और विषय था – वैज्ञानिक शोध में जन्तुओं का प्रयोग उचित अथवा अनुचित और तो और निमंत्रण इतनी देरी से मिला कि तैयारी के लिए हमारे पास दो दिन का समय था । 
                 
                हमारी एक शिक्षिका महोदया थीं जो बारहवीं में अंग्रेज़ी पढ़ाती थीं...बहुत ही गुणी और ज्ञानवान थीं, कॉन्वेंट एजुकेटे थीं, हाई क्लास भी थीं और व्यवहार से काफी सह्रय भी थीं । उन्हें अपने विद्यालय में देखकर यही महसूस होता था कि हम किसी बहुत मंहगे स्कूल में तो हैं नहीं तो ये मैडम ग़लती से यहां आ गई होंगी । बहरहाल जब उन्हें इस प्रतियोगिता के विषय में पता चला तो उन्होंने यही कहा कि तुम लोग बैक आउट कर लो, बड़े-बड़े स्कूल वहां आयेंगे और तुम लोगों की कोई तैयारी नहीं है तो मैंने उनसे कहा – कोई बात नहीं मैम, बिना सामना किये मैं हार नहीं मानना चाहती, पहली बार मौक़ा मिला है , कुछ नहीं तो तजुर्बा ही होगा कि आख़िर उसमें होता क्या है । ये कहकर हम अपनी तैयारियों में लग गए । 


हमें इतिहास और संस्कृत पढ़ाने वाली हमारी शिक्षिका महोदया ने कुछ आधारभूत जानकारियों से अवगत कराया कि एक साथी को पक्ष और दूसरे को विपक्ष में अपने मत रखने होंगे । फिर क्या था,  विषय का विपक्ष जो अधिक कठिन प्रतीत हो रहा था वो मैंने लिया और अपनी साथी मित्र को पक्ष में बोलने का प्रस्ताव देकर हम अपनी  तैयारियों में जुट गये....अगले दिन रविवार था जब मैं सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक पेपर छांटती रही, विषय-वस्तु तलाशती रही। ऊकरू बैठे-बैठे पैर झिनझिना चुके थे लेकिन इतना वक्त हो जाने के बाद भी पक्ष में तो विषय-वस्तु और सामग्री मिली किन्तु विपक्ष के लिए काफी कम । ऐसे में मन का डगमगाना स्वाभाविक था कि मैं अपना पाला बदल दूँ पर मन ये स्वीकृति नहीं दे रहा था । अगले ही दिन जब अपनी शिक्षिका महोदया को ये बात बताई – मैम पक्ष में तो इतना सारा कंटेट मिला है मुझे पर विपक्ष में उससे काफी कम है । तब उन संस्कृत और इतिहास पढ़ाने वाली शिक्षिका महोदया ने मुझे वो विषय-सामग्री मेरी दूसरी साथी को देने को कहा जो मुझे विषय के पक्ष में मिली थी और तब तो और भी बुरा लगा कि मेहनत मेरी और फल किसी और को लेकिन मैं ऋणी हूँ उन शिक्षिका महोदया की क्योंकि उन्होंने मेरे कम विषय-वस्तु और सामग्री को अपनी भाषा से इतनी अच्छी तरह संवारा,सजाया कि मन में फिर से एक विश्वास भर गया ।

                     शायद उन्हें पता था कि उनके किस बच्चे में कम विषय-वस्तु होते हुये भी प्रस्तुति के साथ खेलने का गुण था और किसे ज़्यादा विषय-वस्तु की ज़रूरत थी । उन्होंने ये भी कहा – बेटा क्या पता तुम दोनों हीं पुरस्कार जीत जाओ और विद्यालय का नाम हो, बेटा टीम की तरह जाओ उनकी वो बात दिल को छू गई और पता नहीं था कि उनके शब्द सत्य सिद्ध हो जायेंगे । मैं और मेरी मित्र दोनों ने ही पुरस्कार जीता । द्वितीय पुरस्कार मुझे विपक्ष के लिए और तृतीय पुरस्कार मेरी मित्र को पक्ष के लिए । भले ही हमने प्रथम पुरस्कार नहीं जीता था लेकिन अधिक पुरस्कार जीत कर विद्यालय को ज़रूर उस दिन आगे खड़ा कर दिया था । यहां तक कि जूरी के एक सदस्य ने मुझसे आकर ये भी कहा – बहुत अच्छा बोला , अगर सिर्फ मेरे हाथ में होता तो तुम्हें प्रथम पुरस्कार मिलता, टक्कर कांटे की थी

       इस कहानी से सिर्फ यही बताना चाहती हूँ कि दो शिक्षिकाओं का अलग नज़रिया – एक ने पहले ही हारने को कह दिया था वो उन नेताओं का प्रतीक हैं जिन्हें स्वयं में विश्वास नहीं है और वो कोशिश ही नहीं करना चाहते कि आख़िर ये पड़ी लकड़ी कौन उठाये लेकिन वो दूसरी शिक्षिका जिन्होंने न केवल हमें टीम भावना से प्रोत्साहित किया बल्कि ख़ुद बैठकर हमारी जुटाई चीजों को अपने प्रयासों से सजाया-संवारा,उसे व्यवस्थित किया और ज़िन्दगी भर के लिए ये सीख दे दी कि जब कई लोग साथ हों तो टीम के बारे में किस तरह सोचा जा सकता है । किस तरह ख़ुद आगे आकर अपने सदस्यों का हाथ बंटाया जा सकता है , सिर्फ आदेश नहीं दिया जाता । इसलिए अच्छे नेता का कर्मठ होना असंभव को भी संभव बना सकता है ।


(और अनुभवों की कहानी.........अगले भाग में....)