Thursday, 10 September 2015

माँ मुझे अख़बार चाहिए.....


तुम ढूंढ रही हो मेरे लिए एक साथी,
जो सुख में, दुख में हर पल मेरा साथ निभाये,
मेरे चेहरे पर पूर्णता का भाव जो लाये,
पर माँ कैसे कहूँ तुमसे,
मुझे नहीं तथाकथित समझदार चाहिये,
माँ मुझे एक अख़बार चाहिये ।।

देखा है मैंने बचपन में तुम्हें फूंकनी फूंकते हुये,
मजदूरों के लिए चूल्हा जलाते हुए,
और देखा है तुम्हें शहर में हमारे लिए दाना लाते हुए,
जो समझ सके इन पीड़ाओं को,
मुझे वो कलमकार चाहिये,
माँ मुझे एक जीता-जागता अख़बार चाहिये ।।

जो पिरो सके मेरे एहर-ओहर बिखरे शब्दों को एक माला में,
मुझे ऐसा एक बौद्धिक रचनाकार चाहिए,
माँ मुझे एक अदद अख़बार चाहिये ।।

न चाहिए विलायती, न शहरी,
न निर्धन, न धनी..
माँ मुझे आज़ादी का विचार चाहिये,
माँ मुझे जीता-जागता अख़बार चाहिये ।।

क़ैद भी रखे ग़र वो मुझे,
घर की चारदीवारी में,
घूँघट में, पल्लू में, पर्दे में, साड़ी में,
पर जो दे मुझे बाहरी दुनिया से सम्पर्क साधने के अवसर,
माँ मुझे बस सूचना का अधिकार चाहिये,
माँ मुझे एक अदद अख़बार चाहिये ।।

डरती रही हूँ देखकर अबतक,
जिन पुरूषों की कामोत्तेजना,
उनकी वासना में हो यदि माँझी सा दृढ़ आधार तो,
ऐसी संलिप्तता बार-बार चाहिये,
माँ मुझे एक अदद अख़बार चाहिये ।।

जो करे कटाक्ष बारम्बार, अपनी कलम की धार से,
जो डरे न, उच्च पदों के पलटते वार से,
निर्भीक हो चलता रहे, लिखता रहे,
जो दे सके धार मेरी भी कलम को,
माँ मुझे प्रोत्साहन का वो औज़ार चाहिये,
माँ मुझे एक अदद अख़बार चाहिये ।।

न बन सकी हूं अब तलक़ मैं वो पत्रकार,
फिर भी फाइव 'डब्लयू', वन 'एच' करते हैं मेरे मन पर प्रहार,
जो समझ सके इस हार्दिक पत्रकारिता की पेंग को,
और खींच सके इसका प्रतिबिम्ब अपने ह्रदय में,
मां मुझे वो अनूठा छायाकार चाहिये ।
मां मुझे एक जीता जागता अख़बार चाहिये ।।

न देना मुझे शादी में व्यवहार के लिफ़ाफे,
न ही दहेज के नाम पर कोई उपहार चाहिये,
माँ मुझे एक जीता-जागता अख़बार चाहिये ।।

पर उस अख़बार में हो संवेदनशीलता,
जो ढकोसलों से दूर हो,
केवल छप जाना ही न हो जिसका धर्म,
अपने काले पुते पन्नों पर जिसे आती हो शर्म,
जो जला सके क्रांति की चिंगारी और बदलाव की बयार,
माँ मुझे वो क्रांतिकार चाहिये,
माँ मुझे एक ऐसा पत्रकार चाहिये,
माँ मुझे एक अदद जीता-जागता अख़बार चाहिये ।।

यदि न मिले अख़बार ऐसा,
तो माँ बस रहने दे मेरे हिस्से तुझ सा सादा जीवन,
और बाबा जैसे उच्च विचार चाहिये,
नहीं चाहिये कोई अख़बार,
माँ मुझे तेरे आंचल में ही संसार चाहिये,
माँ मुझे बस तेरा प्यार चाहिये,
और साथ में अपनी कलम की धार चाहिये।।


 
         

Wednesday, 26 August 2015

देश के प्रमुख समाचार पत्रों के सम्पादकों के नाम पत्र


आदरणीय सम्पादक जन,
भारतीय समाचार पत्र
भारत

महोदयों,

एक भारतीय नागरिक का आप सभी विद्वजनों से निवेदन है कि कृपया भारतीय संविधान की प्रस्तावना के विषय में स्मरण करने का प्रयास करें । जो कहता है  हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को : सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

अब ज़रा एक नज़र आज के लगभग सभी बड़े अख़बारों की मुख्य-पृष्ठ की सुर्खियों पर-

·         हिन्दू घटे, मुस्लिम बढ़े
·         हिन्दुओं की धीमी, मुस्लिमों की तेज़  (आबादी की रफ़्तार)....{देश-विदेश वाले पेज तक जारी }
·         यूपी में हिंदू-सिख घटे, मुस्लिम-ईसाई बढ़े.....
·         Hindu Proportion of India’s Population less than 80%

अब यदि भारतीय संविधान की प्रस्तावना के आधार पर देखा जाये तो उपर्युक्त शीर्षकों में क्या है भारत के लोगों की परिभाषा ? कौन हैं "हम भारत के लोग" ? कहां हैंं सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राज्य  की झलक ? कहाँ है समाजवादी सोच जहां सबको मिले समान अधिकार ? यहांं तो गणना ही इस आधार पर जारी की जा रही है ताकि वोट बैंक बांटे जा सकें और हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ आज स्तम्भ के स्थान पर सत्ता का शस्त्र बना दिख रहा है । आज धार्मिक आंकड़े जारी हुए हैं, तो वहीं जातिगत आंकड़ों को जारी करने की मांग बढ़ गई है । दरअसल हर कोई अपने-अपने वोट बैंक को पहचानना जो चाहता है । ये जनगणना नहीं, ये धार्मिक और जातिगत मतगणना है । अब काहे की पंथ निरपेक्षता और कैसा लोकतंत्र ? जब एक धर्म- निरपेक्ष राष्ट्र के समाचार पत्र ऐसी छवि प्रस्तुत कर रहे हों । 


यह सत्य है कि न्याय अब भी कहीं न कहीं जीवित है, विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है किन्तु धर्म और उपासना की स्वतंत्रता के नाम पर स्वतंत्रता केवल नाम मात्र की है क्या ?  जब आप और हम ये मानते हैं कि भारत का धर्म सहिष्णुता मेंं निहित है तो कैसे कर सकते हैं हम ये अनुदार व्यवहार ? अब क्या वर्तमान सरकार इन आंकड़ों के अनुसार मंदिर, मस्ज़िद, गिरिजाघर बनवायेगी ?

क्या विकास के बाकी सारे मुद्दों पर कार्य पूर्ण हो चुका है ? 

यदि आय के आधार पर एकत्रित आंकड़ों को सार्वजनिक किया गया होता और आप जैसे भद्र जनों ने आर्थिक आधार पर मेधावियों को आरक्षण देने का मुद्दा उठाया होता तो अधिक प्रसन्नता होती । यदि ये आंकड़े देश के विभिन्न हिस्सों की साक्षरता वृद्धि या लिंगानुपात समानता को दर्शाते तो भी बहुत संतोष मिलता । चलिए ये आंकड़े जारी हुए भी तो क्या , एक ज़िम्मेदार जनमत निर्माता होने के नाते आपको क्या करना चाहिए था ? 

आदरणीय वरिष्ठ जनों आपको स्मरण हो कि हम बचपन से आज तक पढ़ते आये – "हिन्दू- मुस्लिम, सिख-ईसाई, आपस में सब भाई-भाई ", तो आज भाईयों की संख्या कैसे गिनने लगे ? कोई और नज़रिया नहीं था क्या हमारे पास ? क्या आवश्यक था धर्म के आधार पर जनगणना को इतने बड़े स्तर की ख़बर बनाना अंदर से आत्मा ने धिक्कारा नहीं ? ईद पर बड़े चाव से सिवईयां खाते हैं, क्रिसमस और न्यू ईयर की पार्टी करते हैं और फिर इस तरह का जनमत निर्माण करते हुए अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास नहीं हुआ हमें ? किसी ने इस ख़बर को छापने का कोई दूसरा तरीका नहीं पाया ? संवेदनाओं के इस देश में हमारी संवेदनायें ऐसी कब हो गईं ? हो सकता है कि  आप सभी विद्व जनों का तात्पर्य वो न हो जो हम जैसे मूर्ख  समझ रहे हों, किन्तु क्या करें , सभी आप जैसे बुद्धिजीवी तो नहीं । उन्हें तो क्रोध आया ही होगा जो तथाकथित भक्त हैं और वे आपकी मंशा को पूरा भी कर देंगे । 68 वर्ष पहले तक जो अंग्रेज़ करते थे, वो अब हम स्वयं अपने साथ कर रहे हैं । अख़बार की ये हेडलाइन्स तय करने के बाद भी क्या आप सब अपने आस-पास या फिर अपने ही कार्यालय में काम करने वाले किसी सरफ़राज के साथ वैसे ही चाय की चुस्कियों का मज़ा ले पायेंगे जैसे अब तक लेते आये हैं ? क्या किसी आफ़ताब की आंखों में अपने लिए वही प्यार देख पायेंगे जो अब तक देख रहे थे या फ़िर आप सबको इससे कोई असर ही नहीं पड़ता ?

राखी क़रीब है, रानी कर्मवती की आत्मा भी जब सोचती होगी कि जो हुमाँयू उसका संदेश मिलते ही भागा चला आया था, उसकी आने वाली पीढ़ियों को इस तरह गिना जायेगा । अग़र ख़बर थी भी तो इसे गौण बनाना तो आपके हाथ में रहा होगा ना ? क्या ये भी तय करने का अधिकार हमने इंसानों के चोले वाले भगवानों को सौंप रखा है ?

माना कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं रही, पर क्यों इस पेशे की बची खुची इज़्जत की नीलामी इस क़दर कर रहे हैं हम ! पता नहीं, ये सब हम जैसे नागरिकों की समझ से बाहर है । हम स्वयं को किंकर्त्व्यविमूढ़ पा रहे हैं । हमारे पास पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं है लेकिन अग़र अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकारों की समझ ऐसी होती है तो हम मूर्ख ही बेहतर हैं । हो सकता है कि हमें इस पेशे की बारीकियों की जानकारी न हो इसलिए हम ऐसा कह रहे हों किन्तु क्या करें मन की अकुलाहट और छटपटाहट ने कोई चारा भी नहीं छोड़ा था । यदि अल्पज्ञता के कारण कुछ भी ग़लत कहा हो तो  मैं भारत का एक आम नागरिक क्षमाप्रार्थी हूं । अन्त में ये पंक्तियां जो बचपन में किसी कक्षा में पढ़ी थीं-

तुम राम कहो, वो रहीम कहें, दोनों की ग़रज़ अल्लाह से है।
तुम दीन कहो, वो धर्म कहें, मंशा तो उसी की राह से है।
क्यों लड़ता है मूरख बंदे, यह तेरी ख़ाम ख़याली है।
है पेड़ की जड़ तो एक वही, हर मज़हब एक-एक डाली है।


मन को यदि सुकुन मिला तो ये देखकर कि देश में चन्द फीसदी लोग ऐसे भी हैं जिनका कोई धर्म नहीं । काश ! पूरा देश ऐसा धर्महीन हो जाता और अपने कर्तव्यों को अपना धर्म बना पाता और आप सब अपना पत्रकारिता धर्म उचित रूप से निभा पाते । इस काश ! की कल्पना कब पूर्ण होगी पता नहीं किन्तु आशा है कि आप भी कभी आत्मावलोकन करेंगे और अपने उत्तरदायित्व को समझेंगे । भावी पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाईये , रास्तों में  संकीर्ण मानसिकता के अवरोध नहीं । धन्यवाद ।
                                                                                                                                                                                                                                                               प्रार्थी

                                                                                                                                                                                                                                                       एक भारतीय नागरिक                                                                                                

Sunday, 8 March 2015

जब तक तुम हो, मैं हूँ.....

अजीब इत्तफाक़ है, तुम्हीं ने मुझे कमज़ोर बनाया, डराया,धमकाया,
तुम्हीं मेरे दुश्मन बने बैठे थे ज़माने में,जिसके कारण ज़माने ने मुझे हद में रहना सिखाया,
तुम्हीं थे जिसकी घूरती निगाहों से मैं घबराई थी, चकराई थी,
पर फिर तुम्हीं थे जिसने मेरे लिए आवाज़ उठाई थी, तुम्हीं थे जिसने प्यार से देखा तो मुझे अपनी ख़ूबसूरती का एहसास हुआ,
तुम्हीं थे ,जो मुझे अनदेखा करके निकल गए तो अपनी कमी का आभास हुआ,
तुम्हीं से बचना था और तुम्हारे लिए ही सजना था,
मैं खुला हीरा हूँ जिसे हर कोई चुरा सकता है, उस हीरे के जौहरी भी तुम्हीं थे...
मैं तो सड़क पर पड़ा मिठाई का डिब्बा हूँ जिसे कोई भी कुत्ता नोंच कर खा सकता है, वो कुत्ते भी तुम्हीं थे...
मुझे अवहेलना मिली, तो वो भी तुम्हारी मर्ज़ी थी,
मेरे तन को ग़र तेरा एहसास मिला तो वो भी तेरी ही अर्ज़ी थी,
मेरी रज़ामंदी से कब तूने मुझे पाया, मैंने समर्पण कर दिया तो वो प्यार कहलाया,
और ना किया तो बलात्कार कहलाया....
जब तलक़ दिल किया,जी बहलाया, जब चाहा तब हाथ छुड़ाया,
तेरी ही तारीफ़ से मेरा रंग निखर जाता और जब तेरा लहज़ा बदल जाता तो अभद्र टिप्पणियों का दौर नज़र आता..
तेरे ही साये में मैंने ख़ुद को महफूज़ पाया, तेरे ही गन्दी निगाहों से ख़ौफ खाया...
मेरा तो कुछ था ही नहीं,
जो था सब तुम्हारा था ....ये संघर्ष मेरा कभी था ही नहीं,
ये युद्ध था पुरूष बनाम पुरूष का.....
विरोध भी तुम्हारा था और साथ भी तुम्हारा था....
फिर काहे का महिला दिवस और काहे की बधाई....
आज भी महिलाओं को सम्मान देते हो तो इसलिए कि अच्छे पुरूष कहला सको...
और नहीं देते तो इसलिए ताकि उन्हें दबा सको....
कभी ख़ुशी से, दिल से बराबरी का हक़ दे पाओगे ?
क्या वो तुम्हारा नेतृत्व करे तो सह पाओगे.....
यदि वो तुमसे अधिक सफल हो, तो भी क्या तुम मुस्कुराओगे....
क्या बिस्तर पर उससे पूछोगे,उसकी इच्छाएँ और साथ घटी दुर्घटनायें...
या अब भी सफेद चादर बिछा कर, उस पर तोहमत लगाओगे....
सच चुभ रहा है ना ?  क्या सोच रहे हो नहीं, नहीं मैं ऐसा नहीं हूँ....
तो फिर कैसे हो तुम ? ज़रा मुझे भी बताओ.....अपना हाथ बढ़ाओ....
क्या इस उज्जड महिला का भी सम्मान करोगे तुम ? जो ऐसे बेतुके सवाल करती है ?
जो बेशर्मी से इज़हार करती है.....
अगर तुम्हारा जवाब हाँ है तो – शुक्रिया
क्योंकि तुम्हारे बिना मैं कुछ नहीं......मैं तुमसे ही हूँ.....और संघर्षशील रहूँगी, जब तक तुम हो ।
  
 

Friday, 20 February 2015

मन की फिरौती


कैसी ये अजब चुनौती है,
ख़ुद से ख़ुद की,
व्याकुल मन की,
ये कैसी एक फिरौती है,
जिस मोड़ को छोड़ बढ़े आगे,
जिस डोर से रिश्ता तोड़ लिया,
जब व्याकुल मन की पेंग बढ़ी,
फिर उनसे रिश्ता जोड़ लिया,
जल के भीतर भी चैन न था,
जल के बाहर ना साँस मिले,
भीतर- बाहर, बाहर-भीतर
इक पग ऊपर, पर फिर से अधर,
न जाने साहसी जीवन को है,
किसकी प्रतीक्षा और किसका डर,
ये मन की चाल न जाने, किसके घर की बपौती है !
ये कैसी अजब चुनौती है ।
ख़ुद से ख़ुद की,
व्याकुल मन की,
ये कैसी एक फिरौती है ।


Saturday, 17 January 2015

उम्मीद की धुंधली किरण


कल शाम एक रेस्ट्रां में दो सहेलियाँ बात कर रही थीं। उनमें से एक लख़नऊ से थी और दूसरी दिल्ली से आई थी। लख़नऊ वाली ने पूछा – दिल्ली के क्या हाल हैं ?”  तो दिल्ली वाली बोली – हाल तो बढ़िया हैं, हम दिल्ली वाली लड़कियाँ आज भी स्ट्रेटनिंग कराने में काफी आगे हैं। हमारे स्टाईल और मेकअप के आगे कोई कहाँ टिकने वाला है।” 

इतने पर ही बात काटते हुए लख़नऊ वाली ने कहा – अरे ये सब तो ठीक है पर मौसम का मिज़ाज कैसा है तो वो बोली- यू नो, इट्स टू कोल्ड, लेकिन पॉलिटिकल गहमा-गहमी है।पहली वाली ने कहा–ज़रा खुल के बताओ तो दिल्ली वाली बोली – वो कोई किरण जी ने पॉलिटिक्स ज्वॉइन कर लिया है और लोग कह रहे हैं कि अच्छे दिन लाने में अब वो भी अपना कॉन्ट्रिब्यूशन देंगी।

इतना सुनते ही ये लख़नऊ वाली ख़ुशी के मारे तपाक से बोली –किरण जी, तुम्हारा मतलब मेरी आदर्श किरण जी ! 
दिल्ली वाली लड़की-ओएमजी ! ये एक रिएलिटी शो की जज के नाम पर तुम इतनी ख़ुश क्यों हो रही हो ? इसमें ऐसा भी क्या है

जवाब में लख़नऊ वाली लड़की बोली- अरे यार, अजीब हो, रिएलिटी शो की जज किरण जी तो बहुत पहले से राजनीति में हैं। लगता है तुम्हें अधूरी न्यूज़ पता है । ये तो वो किरण जी होंगी जो मेरी आदर्श हैं। मैं वो लड़की हूँ जो हर उस महिला की शुक्रगुज़ार है जिसने महिलाओं के लिए नये रास्ते खोले । पहली आईपीएस, पहली पर्वतारोही, क्रिकेट टीम की पहली महिला कप्तान, पहली महिला बॉक्सर, और पहली अमुक फलाँ...फलाँ.....। हर लड़की ने अपनी- अपनी रूचि के हिसाब से अपने आदर्श चुन लिए , लेकिन जिन लड़कियों का आईपीएस सेवा से कोई लेना देना नहीं था वो भी किरण जी को आदर्श मानती हैं। लेकिन मुझे उनके एक फ़ैसले पर अफ़सोस हुआ था जब उन्होंने चेहरे से मार्क्समिटाने वाली एक क्रीम का विज्ञापन किया था । उस वक़्त मैंने यही सोचा था कि ऐसी कौन से मजबूरी थी जिसने ऐसे उच्च आदर्शों वाली महिला को एक क्रीम का विज्ञापन करने पर विवश कर दिया था ।

दिल्ली वाली- ओहो, आई गॉट इट , बट ट्रुली स्पीकिंग यार उस क्रीम से तो मेरे चेहरे के मार्क्स, नो – मार्क्स में बदले ही नहीं...तेरी आइडियल ने भी झूठा वादा किया ना । ये सारे पॉलिटिशियन्स होते ही ऐसे हैं ।

लख़नऊ वाली – महोदया आपको कुछ पता भी है, मेरी किरण जी बहुत ईमानदार हैं , कभी बेईमानी नहीं की उन्होंने ।
दिल्ली वाली – क्या वो हमारे झाड़ू और धरना ट्रेंड सेटर से भी ज़्यादा ऑनेस्ट हैं ?
लख़नऊ वाली- जी हाँ,और तुम्हारे धरना कुमार के साथ हर क़दम पर खड़ी थीं हमारी किरण जी।
दिल्ली वाली(इस बार तंज कसते हुए) - अच्छा.... काफी दिन से साथ में ऐसी कोई उम्मीद की किरण दिखी नहीं ।
लख़नऊ वाली-(सोचते हुए..)- वो.....वो....वो तुम्हीं ने तो कहा कि अब वो अच्छे दिन लाने में कॉन्ट्रीब्यूशन देंगी ।
दिल्ली वाली – अच्छा हाँ, याद आया, मैं तो भूल ही गई थी । यस,यस यू आर राइट ।

(लेकिन इस पल में ही लख़नऊ वाली इस लड़की के मन में कुछ खटक सा गया और उसके बाद उसका लहज़ा बदलता चला गया ।)

लख़नऊ वाली- यार देखो, किरण जी चाहे आदर्शवादी और तुम्हारे ट्रेंड सेटर धरना कुमार के साथ खड़ी हों या फिर अच्छे दिन लाने की जुगत में....... कम से कम दोनों ही सूरतों में दिल्ली वालों के दोनों हाथों में लड्डू हैं । क्योंकि ईमानदार तुम्हारा धरना कुमार भी है और मेरी आदर्श किरण जी भी । कम से कम ख़ुशी मनाओ इस बात की , कि अगर वो इन चुनावों में खड़ी होती हैं तो दिल्ली एक बार फिर इतिहास दोहराएगी , बेहतर विकल्पों में टक्कर का इतिहास ।

दिल्ली वाली - यार दिल्ली की पब्लिक धरना कुमार से प्यार तो बहुत करती है लेकिन वोट............मुश्क़िल है । पर मुझे केजू से बड़ी हमदर्दी है। अकेले ही उसने सबकी हवा टाइट कर दी थी । राजस्थान की चीफ मिनिस्टर भी ट्रेंड फॉलो करने लगी थीं, ट्रैफिक़ सिग्नल पर वीआईपी गाड़ियाँ रूकने लगी थीं । बड़े- बड़े मंत्री गाँधी-गाँधी चिल्लाने लगे थे , लेकिन ग़लती केजू की ही है , उसे राजनीति का एक्सपीरिएन्स नहीं था ना , इसलिए उसने दिल्ली की जनता के प्यार और विश्वास में पूरे देश के प्यार और विश्वास की उम्मीद लगा ली.....उसे लगा शायद पूरा देश उसे पसंद करता है ...और फिर दिल्ली तो उसकी अपनी है, उस पर फिर भरोसा कर लेगी और ये सोच कर मेरे केजू ने दिल्ली की कुर्सी का मोह त्याग दिया। कोई और होता तो एक गद्दी तब तक ना छोड़ता जब तक उसे दूसरी नई और बड़ी गद्दी ना मिल जाये । बस यहीं ग़लती हो गई मेरे केजू से......नादान था ना ......जबकि मोटा भाई को ही ले लो...उन्होंने पहले जाल बिछाया...बड़ी कुर्सी का इंतज़ाम किया और उसके बाद छोटी कुर्सी पर अपनी पसंद के मोहरे को बिठा दिया ...और क्या पता इस बार दिल्ली इलेक्शन्स में एक और मोहरा उस बड़ी कुर्सी की ताकतों को कॉन्ट्रीब्यूशन दे दे । काश ! तेरी किरण जी ने मेरे केजू का साथ दिया होता तो शायद आज मेरे केजू की हालत कुछ और होती पर क्या करें आख़िर तेरी किरण जी हैं तो इंसान ही...कुछ एम्बिशंस तो उनकी भी होंगी ना। तेरी किरण जी की असली परीक्षा तो अब होगी कि वो अपनी ज़िन्दगी भर की ईमानदारी की  जमापूँजी को ख़र्च करेंगी और उससे दिल्ली को ख़रीदने की कोशिश की जा सकती है ।

(लख़नऊ वाली लड़की की आंखे फटी की फटी रह गईं कि आख़िर ये दिल्ली वाली फैशनपरस्त लड़की ने इतना सोच कैसे लिया । उसके दिमाग़ में घंटियाँ बजने लगीं। फिर उसने थोड़ा दिमाग़ दौड़ाया और सोचा कि अपनी किरण जी को सही कैसे साबित करे और फिर इस निष्कर्ष पर पहुँची ।)

लख़नऊ वाली लड़की- यार देख, मेरी किरण जी की ईमानदारी पर तो किसी को भी शक़ नहीं है तो अगर उनकी सेना रामसेना निकली तो वो हनुमान की भूमिका में जनता और जनता के सेवक राम की सहायक कहलायेंगी और यदि उनकी सेना रावणसेना निकली तो वो विभीषण की भूमिका में होंगी और अच्छाई का साथ किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगी, और इस तरह उम्मीद  की किरण को धुंधली नहीं पड़ने देंगी ।

(ये पूरा वाक़या देखते सुनते मैं 2 कप कॉफी ख़त्म कर चुकी थी । भला हो उस कॉफी का जिसने मुझे बिठाये रखा और उन्हें लगाए रखा ।)

डिस्कलेमर- धार्मिक नामों का उल्लेख प्रतीकों के रूप में किया गया है। किसी की भी धार्मिक भावनाएं आहत करने की लेखक की मंशा नहीं है ।) 

Sunday, 11 January 2015

वसुधैव कुटुम्बकम्

देखिए वाइब्रेंट गुजरात सम्मिट चल रहा है । आज से 3 दिन तक चलेगा और इसकी शुरूआत होते ही माननीय प्रधानमंत्री जी ने  वसुधैव कुटुम्बकम् की विचारधारा विश्व के समक्ष रख दी है । वो वहाँ सबका साथ, सबका विकास के नारे दे रहे हैं। अब वो लोग जो ख़ुद को सेक्युलर नहीं मानते पर स्वयं को प्रधानमंत्री का परमभक्त कहते हैं , उन्हें साष्टांग प्रणाम करते हैं । जिन्हें हिन्दुत्व के अतिरिक्त अन्य सभी धर्म एक षड्यंत्र नज़र आते हैं, वो भला कैसे सबका साथ , सबका विकास मानेंगे ? कहीं सबका साथ देते देते किसी अमुक धर्म ने अपने परिवार की संख्या बढ़ा ली तो ?  तो फिर उन परमभक्तों के घर की महिलाओं को भी कम से कम चार बच्चे पैदा करने वाली मशीन बनना होगा । यदि ये न हो सका तो सारे कार्य छोड़कर सबको घरवापसी कराने का काम करना होगा ।

ज़रा सोचिए एक परिवार में क्या होता है जब एक भाई दूसरे से ज़्यादा तरक्की करने लगता है, तो ईर्ष्या और द्वेष जन्म लेते हैं , फिर उस प्रतिस्पर्धा में दूसरा भाई भी मेहनत करता है और इस तरह होता है विकास । जब तक प्रतिस्पर्धा नहीं होगी, विकास कैसे होगा और इस प्रकार की प्रतिस्पर्धा को जन्म देने के लिए ये भी आवश्यक है कि सम्पूर्ण विश्व को अपना परिवार मान लिया जाये । परिवार वैसे तो समाज की प्राथमिक ईकाई है और एक परिवार , कभी अपने पड़ोसी परिवार की तरक्क़ी से ख़ुश हो ही नहीं सकता जब तक पड़ोसी परिवार की तरक्क़ी से उस प्राथमिक परिवार को कोई लाभ ना हो रहा हो । यदि पड़ोस वाले की तरक्क़ी से अपने चार काम बनते हैं तो हम भी रोआब झाड़ लेंगे । हमसे बहस नहीं एसीपी फलाँ हमारे पड़ोसी, हमारे अच्छे दोस्त हैं, अक़्ल ठिकाने लगवा देंगे ,समझे  

वैसे 7 से 9 जनवरी तक गुजरात में  प्रवासी भारतीस दिवस का आयोजन हुआ और प्रवासियों को निवेश के लिए आकर्षित करने के मक़सद से उत्तर-प्रदेश सरकार ने भी एअर पोर्ट से योजनास्थल तक  यू. पी. राइज़िंग के पोस्टर लगवाये थे , जिसमें उत्तर –प्रदेश में पनप रही संभावनाओं का ज़िक्र था लेकिन सम्मिट शुरू होने से पहले ही गुजरात सरकार ने उन पोस्टर्स को उतरवा दिया । गुजरात सरकार इसे अवैधानिक बता रही है जबकि उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि वो इस आयोजन में बराबर के हिस्सेदार हैं इसलिए उन्हें अपना प्रचार करने का अधिकार है और साथ ही यू.पी. सरकार का कहना है कि सारी कार्यवाही पूरी होने और गुजरात नगर निगम से अनुमति लेकर ही ये पोस्टर्स लगवाये गये थे । उत्तर –प्रदेश के मुख्यमंत्री वैसे तो ख़राब मौसम के चलते इस सम्मिट में शामिल नहीं हुये पर शायद ये भी संभव है कि इस घटना से उनके मिज़ाज का मौसम बिगड़ गया हो । हम कहते हैं चलिये अगर वो पोस्टर वैधानिक नहीं भी थे तो भी गुजरात सरकार दो दिन की अवैधानिकता ही सह लेती, सम्मिट के बाद पोस्टर हटवा लेते , लेकिन नहीं, प्रवासी निवेशकों को भला दूसरे राज्य की तरफ़ आकर्षित कैसे होने देते ! अभी कोई गैंगरेप या मार-पीट की ख़बर होती तो यूपी को सबसे आगे खड़ा कर देते । यही तो है वसुधैव कुटुम्बकम् का आरम्भ , हर बात की शुरूआत अपने घर से ही तो होती है।परिवार का एक सदस्य दूसरे की तरक्क़ी कैसे देख सकता है । आशा करते हैं,वाइब्रेंट गुजरात सम्मिट पूरा होने के बाद घर वालों को भी ये सीख दी जायेगी कि वास्तव में वसुधैव कुटुम्बकम् का अर्थ है क्या।अभी तो मेहमान घर आये हुए हैं तो ज़रा अतिथि देवो भवः की परम्परा निपटा ली जाये, फिर आपस में भी निपट लेंगे ।