Tuesday, 22 May 2012

ओजस्विनी की कहानी



       वो अजनबी रात....

एक दिन एक अजनबी रात,
जब मैं थी उनके पास,
पर मैं अकेली नहीं थी उस रात..
हर बार की तरह हमारे बीच सन्नाटा था..
मैं करती रही प्रतीक्षा उस सन्नाटे के चले जाने की,
पर उसे ना जाने क्यूँ मेरी हालत पे तरस नहीं आया..
इस रात की प्रतीक्षा में मैंने अनवरत् ही दो वर्ष गुजारे थे...

यही सोचकर मैंने सन्नाटे को दरकिनार कर..अपनी सीमाओं को पार कर...
बढ़ा दिया उनकी तरफ़ अपनी बाहों का हार...
पाने को उनका प्यार...
बह रही थी मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धार..
वो मेरे पास ही कर रहे थे विश्राम,
हल्का संगीत हमारे आस-पास विचार रहा था...
पर वो शायद आज भी यही चाहते थे कि मैं ही झुकूँ फ़िर से,
पर प्रिये मैं तो सदा से ही तुम्हारे सामने नतमस्तक थी...

ख़ैर अपने अहं को कुछ पल के लिए दूर कर...
बांधा मैंने तुम्हें अपने आलिंगन पाश में..
सिमट गई मैं तुम्हारी दौड़ती हर श्वांस में..
मेरा मस्तक तेरे ह्रदय पर था..
जो पत्थर सा कठोर था..
जैसे ही मेरे अश्रुओं की बूंदें गिरी उस कठोर पत्थर पर..
वो पिघल गया...  
तूने झट मुझे अपनी बाहों का सिराहना दिया..
प्रतिउत्तर में अपने आलिंगन का सहारा दिया..

मुझे ना कोई भय था,ना संकोच..
पर तेरी ह्रदयगति असाधारण थी..
तूने घबरा कर मुझसे कहा-मैंने क्या किया ?”
पर फ़िर सन्नाटा लौट आया हमारे बीच अपनी आंखे फाड़े..
पर इस बार तूने उसे हमारे कक्ष से बाहर भेज दिया..
मेरे बालों को सहलाते हुए तूने पूछा-ये आंसू ख़ुशी के हैं या ग़म के,इतना तो बता सकती हो?”
मैंने कहा- तुम मुझे नहीं चाहते!”
उन्होंने मुझे पुचकारते हुए कहा-अग़र मैं तुम्हें नहीं चाहता तो क्या तुम मेरी बांहों का तकिया बना पाती?”
मैंने कहा –मुझे ये तकिया जीवन भर क्यों नहीं मिल सकता?”
ये सवाल सुनकर उन्होंने लंबी आह भरते हुए कहा-मेरे दिल को बहुत चोट लगी है,मेरे पास तुम्हें देने को कुछ भी नहीं है।"
मैंने कहा-"आपके जीवन में स्थान के सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिेए।"

मैंने उन्हें और भी अधिक सामर्थ्य से स्वयं में जकड़ लिया था,
उनकी उंगलियाँ निरन्तर मेरे बालों को सहला रही थी।

उन्होंने मेरे मस्तक पर रख दिया अपना प्यारा सा चुम्बन.....और कर लिया था मेरा पूरा आलिंगन,
आज ऐसा प्रतीत होने लगा था कि "मैं तेरी 'ओजस्विनी' हूँ और तू मेरा ही "सौन्दर्य" है।

वो मुझे हँसाने की कोशिश करते रहे व्यंग्य की चुटकियाँ लेकर,
मैंने भी उनके हृदय पर पटक दिये अपनी मुट्ठियों के कुछ गट्ठर,
उनसे ये कहकर-"तुम बहुत दुष्ट हो कितना सताते हो!"
वो कहने लगे-"फिर भी तुम इस दुष्ट से इतना प्रेम करती हो!" 

मैं फिर मुस्कुरा दी और अपनी मुट्ठियों को खुला छोड़ दिया था मैंने,
उन्होंने भी अपने हाथों को मेरी खुली हथेलियों में समेट दिया।
मैं समर्पण भाव में निढाल सी एक पूर्ण विश्वास से भरी हुई कुछ इस तरह पड़ी थी...
मुझे विश्वास था ख़ुद पर और उन पर कि मेरी 'अस्मिता' भंग ना होगी...
और मेरा विश्वास सत्य ही था क्योंकि 'ओजस्विनी' और 'सौन्दर्य' तो एक-दूसरे से मन से प्रेम करते हैं।
      उन्हें अपनी सीमाओं का भान है,दो वर्ष दूर रह कर भी जब "ओजस्विनी" का मन विचलित ना हुआ तो भला अब कैसे होता!

अन्धकार कुछ और गहरा गया था,
रात्रि का अंतिम प्रहर भी निकट आ गया था...
अब हमने अपने शब्दों को विराम दिया..
उनके स्नेहमयी चुम्बनों ने मेरे अश्रुओं को थाम लिया..
अब उनकी हृदयगति भी पहले से मन्द थी,
वो सुकूँ से मुझे अपने आलिंगन में समेटे, मुझ पर अपना स्नेह लुटा रहे थे,

मेरे मस्तक का उनके हृदय से मिलन,
उनकी हथेलियों का मेरी हथेलियों से मिलन,
उनके चुम्बन की मेरे मस्तक,नेत्रों और ओष्ठों तक की यात्रा...
और हमारे बीच पसरा वो निःशब्द "सन्नाटा"...
फिर पुनः लौट आया था मौन की अनुभूति लेकर,
पर अब हम उस सन्नाटे को तोड़ना नहीं चाहते थे..
उसके होने पर भी हमें आनन्द की अनुभूति थी,
क्योंकि इस बार वो हमें जोड़ने आया था,
           
वो अजनबी रात अब मेरे लिए चिर-परिचित बन चुकी थी,
हम उस रात्रि के अंतिम प्रहर में कुछ यूँ बेसुध से थे कि ना तो हमें सुबह के आने का एहसास हुआ,न ही दिन चढने का,
मैं दीवार के सहारे आँखें बन्द किए बैठी थी,
आँखों में बेहोशी थी..
वो मेरी गोद में अपना सर रखकर,मुझसे लिपटे हुए थे इस तरह,जैसे उन्हें अब मेरे स्नेह की आवश्यकता थी,मैं आँखें बन्द कर उनके बालों को सहलाती रही,
रख दिया मैंने भी अपना चुम्बन उनके मस्तक पर,
पर तभी सूर्य की तेज किरण आ धमकी उस कक्ष में,
हमें भान हो आया कि दिन चढ़ गया है...

दिन की तेज़ रौशनी ने फिर से उनके पिघले हुए दिल को "खौला" दिया...
उनके दिल के "लिक्विड" का "बॉयलिंग प्वाइंट" बढ़ा दिया,
जिसे रात भर मेल्ट किया था हमने अपने स्नेह और आँसुओं से..
जिसे निकाल कर लाये थे हम "डीप फ्रोज़ेन स्टेट" से..
अब वो खौलने लगा था उबल कर..
दूर कर दिया उन्होंने ख़ुद से हमें,
कर दिया 'विदा', स्वयं से दूर कर..

मैं "उस अजनबी रात" के चन्द लम्हों को समेट कर..
चल दी फिर उसी राह पर..
जहाँ मेरी अधूरी कहानी का पूरा एहसास मेरी प्रतीक्षा कर रहा था..
मैं फिर उस अधूरे एहसास में ख़ुद को तलाश रही थी। 
    

Thursday, 19 January 2012

ओजस्विनी की कहानी (एक बार फिर...)

आज एक बार फिर मैं बैठी हूँ,
उसी फ़र्श के पास,
उन्हीं पेड़ो के साथ,
वही दीवारें, वही अमरूद का गाछ,
उसी फ़र्श के बाहर एक टीलेनुमा आकार,
ख़ुद को निहारती हो बेबस कुछ, कुछ लाचार,
कुछ-कुछ वैसी ही शाम,ये शाम का आसमाँ,
जहां कुछ देर बाद रात और दिन का मिलन होगा,
कुछ भीड़ होगी,लोगों का जमावड़ा होगा,
पर उस भीड़ के आने तक मैं यहाँ अकेली हूँ
झाँकती,निहारती,टटोलती अपनी उन यादों का दामन,
जहाँ कल मैं खेली थी।
वो हँसी यहाँ गूँजा करती थी,जहाँ हम संग थे,
चिड़ियों की आवाज़ें आज भी उतनी ही सुरीली हैं
जितनी कल थी,
वो गुलमोहर का पेड़ आज भी वैसे ही झूम रहा है,
जैसे कल था,
पर आज ये सन्नाटा जैसे मुझे चिढ़ा रहा है,
क्यूँ? क्या हुआ? कल बहुत हँसी-ठिठोली करती थी ना,
मैं कहता था मुझे सुन,
पर सुनती नहीं थी ना,
देख आज तू ख़ुद मेरी आग़ोश में चली आई है,
आज तू ख़ुद को मुझे सौंप रही है,
पर आज मैं तुझसे दूर चला जाऊँगा,
मुझे तो हलचल से प्रेम हो गया है,
चिड़ियों की,झूमते पत्तों की,झींगुर की
और इस फ़र्श पर उड़ते तिनकों की हलचल से,
जितना तुझे प्यार है इस शाम के बीते पल से,
आज तुझे मैं रूलाना चाहता हूँ,
तन्हाई का दर्द बताना चाहता हूँ,
इसलिए तेरा तिरस्कार कर रहा हूँ,
तेरे ह्रदय पर अपना ये प्रहार कर रहा हूँ।
तब तू समझेगी मैं क्या कहता था,
अपनी ख़ामोशी से तेरा दिल बहलाता था,
और ख़ुद अकेले में कितने आँसू बहाता था,
जा,तू फिर उसी भीड़ के पास जा,
जहाँ तेरा दिल ना लगे,
तू मुझे याद करना भी चाहेगी तो लौट कर ना आ सकेगी,
चाह कर भी उस भीड़ में किसी को अपना ना सकेगी.
और फिर,
वो सन्नाटा जाने लगा मुझसे कहीं दूर,
मैं उसे जाते हुए देख रही थी,
हो कर के मजबूर,
उसी फ़र्श के पास,
उस टीले पर बैठी,
उन्हीं पेड़ों के नीचे,
उसी हवा के साथ,
बैठी वहीं उदास।।   
16 अगस्त 2010
समय- शाम 6.30 बजे
सुन्दरम् ओझा
लख़नऊ.

Wednesday, 26 October 2011

ओजस्विनी की कहानी (भाग-२)

मित्रों आज दीपावली है...सारा संसार खुशियाँ मना रहा है. जहाँ भी हमारे भारतीय जन प्रसृत हैं वहां दीपों की छठा  दर्शनीय है.,परन्तु आज भी क्या ओजस्विनी खुश है???? जिसके नाम में ही असीमित प्रकाश समाया हुआ है वो आज भी विचलित क्यों हैं? क्या ओजस्विनी इस दीपोत्सव में स्वयं को प्रकाशमान पा रही है ? इससे पहले मैंने आपको ओजस्विनी के मित्र -प्रेम की कथा के  एक अंश से परिचित कराया था आज उसकी कहानी का एक और अंश प्रस्तुत है आपके समक्ष .यदि आप उसके पहले के जीवन से रूबरू होने के इक्षुक हों तो आदेश करियेगा.मैं आपके समक्ष उन अंशों का भी वर्णन करुँगी   .आएये जानते हैं आज की  उसकी मनोदशा उसकी ही ज़बानी...


                                                         ओजस्विनी  और  दीपोत्सव 

आज हूँ विह्वल , आज हूँ व्याकुल ,
जग सारा है उज्ज्वल -उज्जवल,
दीपों की है छठा निराली,
सबकी जगमग है दिवाली,
जीवन से सबके तम हरने,
आई है समृद्धि, खुशहाली , 
ओज हूँ मैं,तेज हूँ मैं,
पर फिर क्यूँ निस्तेज हूँ मैं?
मेरी व्याकुलता का रहस्य क्या.. 
कोई बता दे क्यूँ मैं विस्मृत हूँ?
क्या सच में सब मंगलमय है?
क्या सबके  जीवन में अरुणोदय है?
कहीं कोई पैसों से खेले,कहीं किसी को मिलती गाली..
कैसी है ये दिवाली?
देश मेरा क्यूं भ्रष्ट हो रहा?
प्राण मेरा निस्तेज हो रहा...
कहाँ प्रणय-सौंदर्य है मेरा?
 आज मेरा क्यूँ ह्रदय रो रहा?
पंछी  की कुंजन भी काली..
दिखती नहीं चहक की लाली, 
ये कैसी है कहो दिवाली?
मेरा प्रियतम पूछे न मुझको....
वैसे तुम सब भूले मुझको..
अब मुझको तम ही तम दिखता.
महंगाई ने जान निकाली...
सड़कों पर सोई हूँ मैं.. 
न है ज़मीन पैरों तले ,
न है सर पे छत  की थाली ..
तुम्ही कहो सौंदर्य -प्रणय..
तुम बिन कैसे हो दिवाली?
मिटटी  के दीपक सूने हैं..
बिन बाती ,बिन घी के खाली...
तुम्ही कहो सौंदर्य-प्रणय मेरे..
तुम बिन कैसे हो दिवाली?
मैं  बैठी हूँ इसी प्रतीक्षा में,
तुम आओगे तम हरने को ,
मुझमे नव साहस  भरने को ... 
चूम लोगे मस्तक को मेरे,
कर लोगे आलिंगन  मेरा..
हर लोगे हर विकृति  को मेरी..
मेरे आँचल का हर प्राणी जब खुश होगा ,
देश में जब होगी खुशहाली ...
तब होगा मेरा दीपोत्सव
गर्व से कहूँगी मैं ,
मैं  तेरी ओजस्विनी हूँ!!!


Monday, 24 October 2011

"ओजस्विनी" की कहानी

दोस्तों आज जिस "ओजस्विनी" की कहानी मै आप सबको सुनाने जा रही हूँ  उसका जन्म आज से दो वर्ष पहले मेरी कल्पनाओं में हुआ. वो न जाने कब से उदास थी,जैसे कुछ खो दिया था उसने ....लेकिन खोकर भी पाने का एहसास उससे बेहतर कोई नहीं जनता था. उसने अपनी पिछली जिंदगी को "अधूरी कहानी..... एक पूरा एहसास"  कहा है,पर आज मै उस अधूरी कहानी की बात नहीं करूंगी क्योंकि आज मै ओजस्विनी के उल्लास का वर्णन करना चाहती हूँ.
                       तवारीख़ २० अगस्त २०१०,दिन शुक्रवार ...अरे आज तो जुम्मे का दिन है....एक पाक़ दिन और आज इस नेक की दुआ कुबूल हो गई हो जैसे. आज वो बहुत खुश है..क्यों???? आएये उसी की ज़बानी सुन लेते हैं......

                                                       " ओजस्विनी एक बंदिनी "


आज मै बहुत खुश हूँ,तुम्हें पाकर  अपने पास,
वहीँ जहाँ कल बैठी थी तेरी प्रतीक्षा में,
अनवरत मैं उदास ,
तेरी राह जोहती,
बाट निहारती , ख़ुद का करती उपहास,
मिल "सन्नाटे" के साथ !
मैं तेरी ओजस्विनी हूँ!
आज मै बहुत खुश हूँ , तुम्हें पाकर अपने पास.....
तुम्हें देख पाने की उम्मीद धुंधली  पड़  चुकी थी,
मेरी आँखें भी आंसुओं से सूनी  पड़  चुकी थी...
पर रह-रह कर एकत्रित जल नेत्रों से गिर पड़ता था,
जैसे नल की टोंटी में बचा हुआ पानी,
जो कहता था खाली टंकी  की कहानी.
नेत्रों में स्वाभाविक काजल नज़र आता था ,
जो जागती रातों की कहानी सुनाता था,
तेरे न आने तक मैं सब पे बिगडती थी, 
ख़ुद पर खीझती और चिल्लाती थी ,
पर आज मानो  अचानक मेरे ह्रदय ने,
तेरे दूर पड़ते क़दमों की आहट सुन ली थी ,
और थके हुए चेहरे पर मुस्कुराहट ने जगह ली थी,
ज्यों ही मैं निकली एक कक्ष से बाहर, 
तू  मुझसे  टकराया,
और मेरे नेत्रों की टोंटी का जल पलकों के पात्र  तक उमड़ आया,
पर मेरे अधरों पर एक स्वछंद हंसी तैर रही थी ,
शब्द अन्दर ही अन्दर सिमट जाना चाहते थे. 
उस क्षण मैंने कब अनजाने ही तेरा हाथ थाम  लिया,
तुझे किसी से मिलने भी न दिया,
बस जी चाहता था की  इस पल में कोई दखल न दे, हमें चंद लम्हों के लिए अकेला कर दे,
मै तुझसे कुछ न कहूँ और तू मेरी ख़ामोशी को पढ़ ले ,तूने  मेरे शब्दों के उतावलेपन को देखा था,
ऐसा जान पड़ता था मानो लबालब भरा कोई पात्र था,जो ख़ुद को तुम पर उडेलना चाहता था ,
                              अवसर पाकर एक नवागंतुक मित्र को हम राह दिखाने चले थे,
                               लौटती सड़क पर हमें कुछ पल अपने मिले थे ,
                               जहाँ मैं तुम्हें सुन रही थी ,तेरे साथ चल रही थी ,
                               कुछ मैं भी कह रही थी और राह थम गई ,
                               हम चंद पलों में फिर उस कक्ष में थे ,
                               जहाँ कुछ क्षण पहले मै थी,सब थे,
                                पर अब तुम भी थे.
मेरी ख़ुशी आज सबने देखी  थी,
थकी आँखों की चमक, मेरे शब्दों में चहक,
 आज सबने सुनी थी , 
ऐसा लगता था जो कली  दो दिन पहले मुरझा गई थी,
उसे आज शायद नयी जिंदगी  मिली थी...
वो कुछ खिली -खिली  थी ,
कुछ और वक़्त तेरे साथ बिता पाती ,
यही सोच कर आज तेरे संग चली थी ,
उस दिन संध्या के अंतिम प्रहर में ,रात्रि के चढ़ते शिखर में,
हमने चाय के नुक्कड़ की तलाश की ,
कई सड़कों -चौराहों की खाक छानती,
अंत में एक जगह मिली,
जहाँ न शोर था,न ही "सन्नाटा",
                                          आज वहां बस हलचल थी,
                                          सन्नाटे की वो प्रेमिका,
                                          आज हम दो दोस्तों के बीच चली आई थी,
                                          हम चाय के पात्र हाथों में थामे अपनी बातें सुना रहे थे,
                                           कुछ नगमें  जो अनसुने थे ,                                                                           
                                           जल्दी में गा रहे थे ,
                                           चंद लम्हों में महीनो की बातें समेट  देना चाहते थे,
                                            पर तुम न जाने क्यूँ,आज भी कतरा रहे थे,
                                             तुम्हारी नज़रें जैसे ख़ुद को दोषी मान रही थी ,
                                             पर नहीं मित्र ,दोषी न तुम थे,न हम थे,
                                                 दोषी तो वो भाग्य है ,जिसने मेरे मन में तुम्हारे  लिए प्रेम भर दिया था,
ये जानकर भी की तुम मेरे नहीं हो सकोगे,
शायद वो तुम्हारी  इस "ओजस्विनी " से ईर्ष्या  की  भावना रखता था ,
पर वो शायद नहीं जानता था की "ओज" अपने "सौंदर्य" को पा लेगी ,  
प्रेम के कई रूप हैं ,मित्र-प्रेम एक चरम प्रेम है,
जिसकी बंदिनी ओजस्विनी बन चुकी थी ,
आज सौंदर्य ने उसे जीवन पर्यंत अपनी मित्रता की बंदिनी  बना लिया था ,
जहाँ केवल मानसिक,हार्दिक,मानवीय, पवित्र -प्रेम था .
                                                जहाँ विचारों का प्रेम था,भावनाओं का बंधन था,
                                                 जहाँ लेशमात्र भी भौतिकता न थी ,
                                                 जहाँ बस मधुर स्मृतियों का आलिंगन था ,
                                                  मैं "ओजस्विनी" अपने "सौंदर्य " को निहार रही थी ,
                                                  जिसे कभी मैंने प्रेयसी बन प्रेम किया था अपनी भावनाओं से,
अपेक्षित समयावधि से अधिक संग मिल चुका  था तुम्हारा ,
मुझे तो बस इन स्मृतियों का ही है सहारा,
आज मै बहुत खुश हूँ ,तुम्हें पाकर अपने पास ,
शायद यही हो मेरे जीवन का किनारा ,
जहाँ तुम हो मेरे पास,
स्मृतियों के साथ ,स्मृतियों के साथ.         
  
               

  
   








Friday, 30 September 2011

क्योंकि मैं इस बाग़ से प्यार करती हूँ .....

अब भी न जाने क्यों ,सुकूँ मुझे मिला नहीं...
खोया हुआ है अब भी,मेरी रूह का अदब..
की रात चाँद से हस के, थी चांदनी मिली...
फिर भी समझ ना आया ,मातम का कुछ सबब,
सबके दिलों में प्यार की एक आग थी जगी,
पर कौन है जो उस पर पानी गिरा रहा,
हँसते हुये इक बाग को,है क्यों जला रहा ?
कौन है वो, जो खिलने नहीं देता प्यार की कलियों को,
क्यों जलन के काँटे सबको चुभा रहा,
मैं देख नहीं सकती इन फूलों को टूट कर मुरझाते हुये,
इसलिये आज अपना दामन तार-तार करती हूँ......,
क्योंकि मैं इस बाग से बहुत प्यार करती हूँ।



Tuesday, 7 June 2011

" न्यूटन,मार्क्स ,फेसबुक और पत्रकारिता का स्तर "

अधिकांशतः समाज-विज्ञानियों को बारम्बार कला को विज्ञान सिद्ध करने के प्रयास में रत देखा गया है.महान दार्शनिकों और समाज-विज्ञानियों को न जाने विज्ञान से किस प्रकार की प्रतिस्पर्धा रहती है कि समाजशास्त्र हो या दर्शनशास्त्र , इतिहास हो या नागरिकशास्त्र ,भूगोल हो या मानवशास्त्र,कानून हो या नीतिशास्त्र इन सभी सामाजिक शास्त्रों कि तुलना भौतिकी,रसायनशास्त्र,जीव-विज्ञान एवं गणित से करने कि आदत रही है.न जाने क्यों ये समाजशास्त्री कला कि तुलना विज्ञान से कर कर के उसे विज्ञान अर्थात विशेष ज्ञान सिद्ध करने में लगे रहते हैं जो कि सिद्ध करने कि आवश्यकता है ही नहीं क्योंकि कला का भी अपना महत्व है.
                                                                   यदि वैज्ञानिकों की बात करें तो उन्होंने कभी ये सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया कि विज्ञान एक कला है जबकि वास्तविकता में विज्ञान और गणित दोनों ही व्यवहारिक रूप से कला हैं.चाहे गणित की ज्यामिति की बात करें या फिर उदहारण के तौर पर महान वैज्ञानिक न्यूटन का गति विषयक तृतीय नियम (Newton's Third Law Of Motion) जिसे हम "क्रिया-प्रतिक्रिया"(action - reaction) के नाम से जानते हैं यह वास्तव में जीवन के गतिशीलता चक्र का एक अहम् हिस्सा है और जीवन केवल विज्ञान नहीं अपितु कला भी है...जीने की कला और न्यूटन का यह नियम सार्वत्रिक है क्योकि यदि क्रिया होगी तो प्रतिक्रिया अवश्य होगी और यदि प्रतिक्रिया होगी तो पुनः "प्रत्युत्तर क्रिया" होगी और इस प्रकार"जीवन प्रक्रिया" प्रगतिशील होगी.(EVERY ACTION HAS AN EQUAL AND OPPOSITE REACTION.) अतः संतुलन हेतु यह आवश्यक है.
                                                                   अब यदि बात करते हैं समाज-विज्ञानी मार्क्स की, तो उनके द्वारा प्रतिपादित "इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या" पर विचार करें तो देखते हैं की वहां भी "वाद-प्रतिवाद  और अंततः संवाद" की स्थितियों का वर्णन मिलता है . अब यदि न्यूटन बनाम मार्क्स का युद्ध छेड़ दिया जाये की दोनों में बेहतर कौन है तो यह कह पाना कठिन होगा की श्रेष्ठ कौन है ,क्योंकि दोनों का अपना एक महत्व है और इस युद्ध में हानि समाज की ही होगी क्योंकि यदि दो श्रेष्ठतम और महानतम लोग यदि "स्वस्थ वाद-विवाद"   नहीं करते तो परिणाम वही होता है जो भारतीय  राजनीति में "पक्ष -विपक्ष" होते हुए भी आज तक होता रहा है क्योंकि श्रेष्ठ लोगों ने कभी "स्वस्थ तर्क-वितर्क" में भाग ही नहीं लिया. 
                                                                        देशहित पर राजनीतिक चर्चा करने की बजाय नृत्य की "सुषमा"  पर "स्वराज" का अपमान करने के आरोप की "दिग्विजय " पताका आज पक्ष द्वारा फहराई जा रही है,परन्तु तिरंगा न जाने कहाँ लहरा रहा है या सिमटा जा रहा है.
                                                                        "वाद-विवाद" और "क्रिया -प्रतिक्रिया" का सिलसिला जंतर-मंतर,रामलीला मैदान,प्रेस-कांफ्रेंसों  में जूता  चलने से लेकर फेसबुक से होता हुआ रेडियो,टी.वी. अखबारों से गुजरता हुआ ,संसद की खाक छानता  हुआ अंततः विश्व  की सुरक्षा- परिषद्  तक जारी है जो की बन चुकी अब एक कैंसर ग्रसित बीमारी है क्योंकि यह "वाद-विवाद"(DEBATE) अब स्वस्थ नहीं रहा.
                                                                          आज सत्य को सिद्ध करने के लिए भी साक्ष्य की आवश्यकता है और "आवश्यकता अविष्कार की जननी है" और "व्यर्थ की आवश्यकतायें भ्रष्टाचार की जननी हैं" .कल राम ने सीता की पवित्रता की "अग्नि-परीक्षा" ली थी परन्तु आज बदनाम "पारखी सावंत" का स्वयंवर रचाने  स्वयं "राम" कपूर बन कर जलने आते हैं और वरों  की खोज में परीक्षा रचाते हैं.,,तो वहीँ दूसरी तरफ अग्नि वेश जी अग्नि जलाते नज़र आते हैं.
                                                                           एक मुद्दे पर दो प्रकार की प्रतिक्रियाएं भी इसी  "क्रिया -प्रतिक्रिया" और वाद-विवाद" का कारन  हैं.इतिहास के  पन्नों पर नरम एवं गरम दल के नाम अंकित हैं परन्तु आज समय "उग्र तथा  शांत के एक हो जाने का है और आवश्यकता भी यही है क्योंकि "व्यक्तिगत-हित" से कहीं सर्वोपरि "राष्ट्र-हित" है.आज जब स्वयं दो श्रेष्ठ व्यक्ति "योग" की साधना तथा "समाज सेवा की भावना " को एक कर करीब आते दिख रहे हैं तो हमें भी "गुट -निरपेक्ष" होते हुए एक हो जाने की आवश्यकता है.
                                                                            अंत में बात करते हैं पत्रकारिता के गिरते हुए स्तर की ,तो ये हम सब ने पढ़ा है कि "साहित्य समाज का दर्पण होता है " और दर्पण कभी झूठ  नहीं बोलता. यदि पत्रकारिता पर यह आरोप लगता है की इसका स्तर  गिरा है तो इसके लिए हम,आप और ये समाज बराबर का उत्तरदायी है क्योंकि हमने चाटुकारिता  के स्तर को बढ़ा   कर पत्रकारिता के स्तर को गिराने में सहयोग किया है और ये वही बोलता है जिससे इसकी रोटी सिक जाए और दलील ये देता है की"जो दीखता  है वो बिकता है" अन्यथा पत्रकारिता का स्तर तो इतना उच्च है की इसके समक्ष सब कुछ तुच्छ हो सकता है.अतः आज न्यूटन  और मार्क्स ,बाबा और हजारे,कला और विज्ञानं और अंततः हमारे और आपके संगम की आवश्यकता है.साथ मिल कर एक हो जाने की आवश्यकता है. अतः मेरा आप सभी से विनम्र निवेदन है की "बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध ले ",स्वस्थ वाद-विवाद","क्रिया -प्रतिक्रिया" तथा   "वाद- प्रतिवाद"  में सब मिल जुल कर भाग लीजिये तथा अपने देश,अपने समाज और गिरती पत्रकारिता के  स्तर को ऊंचा उठाने में सहयोग कीजिये. धन्यवाद.

Monday, 6 June 2011

RJ "हार-जीत" उर्फ़ कमलेशदास ओमप्रकाश मेहरा के नाम सुन्दरम का लव-लैटर "

सेवा में,
उदघोषक महोदय,
लखनऊ.
                 महोदय आपसे सविनय निवेदन है कि "ये मेरा प्रेम-पत्र पढ़ कर कि तुम नाराज़ न होना कि तुम मेरी जिंदगी हो...कि तुम मेरी बंदगी हो...." सर्वप्रथम ये गीत आपको समर्पित.आगे सब कुशल मंगल से है क्योंकि कल तीसरा बड़ा मंगल है,अतः सब बजरंगबली की कृपा है. आगे आपको सूचित किया जाता है की हमारे देश भारत में हर व्यक्ति के लिए अपना कार्य निर्धारित है और उसे उस कार्य के  अतिरिक्त अन्य कार्य नहीं  करने  चाहिए.
उदहारण के  तौर पर यदि  योगगुरु को केवल योगासन से ही मतलब रखने की सलाह दी जा रही है और कहा जा रहा है कि उन्हें  राजनैतिक आसन नहीं  कराने चाहिए  तो इस प्रकार से तो एक मनोरंजनकर्ता (entertainer) को भी केवल मनोरंजन आसन करना चाहिए,उदघोषणा आसन करना चाहिए,उसे स्वयं से जुडी  जनता का "राजनीतिक मनोरंजक ज्ञानवर्धन" करने की क्या आवश्यकता? "जो हो रहा है वो ग़लत है और जो शनिवार की रात हुआ वो और भी ग़लत  था" , तो फिर सही क्या है? और कौन करेगा?
                                                            जब अन्ना महोदय ने जंतर पे मंतर चलाया तब भी लोग अपनी झाड़ -फूँक कराने "डेल्ही-बेल्ही" पहुंचे थे अब अग़र लोग रामलीला मैदान में अपनी "सीता"(India की white money) को रावण(corrupt - people )  और उसकी लंका (swiss - Bank ) के  चंगुल से बचाने पहुँच गए तो क्या ग़लत किया? हम तो कुछ करते नहीं पर जो कर रहे हैं उन्हें भला हम दोषी क्यों ठहरा  रहे हैं? यदि ये सत्य है की "अनशन" से राजनीति का कोई "junction " नहीं बदलने वाला तो ये भी सच  है की चुप बैठे रहने से भी कुछ नहीं बदलने वाला. आज  इस बात का एहसास हुआ की "यू.पी.  बोर्ड" सबसे कठिन बोर्ड है,आज "Greenathon" की अच्छाई  दिखी तो "CCL(सेलेब्रिटी क्रिकेट लीग)" की  समाज-सेवा की भावना याद आई,,,आज बहुत सारी अच्छी  बातें हुईं ,उन सब बातों पर चर्चा हुई जो इस बवाल में खो गई सी लगती थी पर सच तो ये है की जिनका आज रिजल्ट आना था उन्हें उसका इंतज़ार था...जिन्ही सेलेब्रिटी मैच देखना था उन्होंने कल भी देखा और जिन्हें समाज- सेवा की भावना "Greenathon " में देखनी थी उन्होंने वो भी देखा...तो ये कहना ग़लत है कि  ये बातें  खो गईं.इन सब बातों से याद आया की जब अन्ना जी अनशन पर बैठे थे तो हमे सिवाय "India Against Corruption" के कुछ भी याद नही था .हम दिन भर एक दिए गए नम्बर  पर miscall  देकर अन्ना जी के सत्याग्रह का साथ देने की अपील  करते और सुनते पाए गए. उस दिन हमे और बातें क्यों छोटी लगीं उस अनशन के सामने?"अन्ना जी ने भी तो यही रास्ता अपनाया था,फर्क सिर्फ इतना है कि  उनका मुद्दा लोकपाल तक सीमित था और बाबा जी का मुद्दा  थोडा बड़ा रहा...जो बातें उसमे सही नही थी उन पर भी एक बार विचार कर बदलाव के बारे में सोचा जा सकता था..पर पर उनके तरीके का इतना विरोध क्यों?
                                      न ही हमें योग का शौक है न ही योग करने का समय और न ही कल तक रामदेव जी से खासा फर्क पड़ता था पर उनसे जुड़े इतने सारे देशवासियों से फर्क पड़ता है..हमें भी और आपको भी...हम सबको. मुद्दा ये है की हम अन्ना जी और रामदेव जी के  मामले में दोहरा रवैया   क्यों अपना रहे हैं जबकि दोनों के तरीके लगभग एक ही हैं..अग़र ग़लत ही ठहराना  था तो उस समय अन्ना जी को भी ग़लत ठहरा देते तब भी समझ आता की  चलो हमें परिवर्तन ही  नहीं चाहिए.
                                      चलिए  हम  ये भी  मान लेतें  हैं की रामदेव जी जो कर रहे हैं या कह रहें हैं वो बिलकुल भी व्यवहारिक  (practical) नही है शायद इसीलिए इतनी मुश्किलें आ रही हैं और आती रहेंगी क्योंकि "आदर्श-राज्य"(Ideal -state) तो केवल "Utopiya "  जैसी किताबों में ही संभव है..वास्तव में नहीं.१००% खरा सोना वो भी बिना मिलावट उपलब्ध नही हो सकता पर ९४ कैरेट गोल्ड पाने की कोशिश तो की जा सकती है."हम हर उस भारतीय का साथ हर उस बात के लिए देंगे जो हमारे देश के हित में है.हम ये नहीं कहते कि   बाबा जी को सत्ता थमा दो पर जिन्हें थमाई है उन्हें थमा कर भी कोई गर्व करने वाला काम नही किया हमने.लोग विवादास्पद (controversial ) मुद्दों पर बोलने से बचते हैं, सबकी जुबां  पे ताले pad जाते हैं पर चाहते हैं कि  देश सुधर जाये.
                         मैं कमलेश जी को ये प्रेम-पत्र कभी नही लिखती क्योंकि वो खुद को रोमांस में पांचवी अनुत्तीर्ण (fail ) जो कहते हैं..पर आज अच्छी -अच्छी  बातों के गुलाब के गुलदस्ते के साथ जो वो एक बड़ा सा काँटा ("जो हो रहा है वो ग़लत है........ग़लत था.") उन्होंने बार-बार चुभोया उससे दर्द हुआ. क्या दिल्ली-पुलिस अपनी मर्ज़ी से वो सब करने पहुंची थी बिना किसी आदेश जो आप उन्हें प्रेम-पत्र लिख कर सत्याग्रह कर रहे थे.इसके पीछे का सच और असली ज़िम्मेदार को तो आप भी जानते हैं फिर बेचारी दिल्ली -पुलिस को अकेले दोषी ठहराने   का क्या फायदा? 
            वर्ल्ड-कप के बाद आज ये सोच कर रेडियो खोला था की कुछ नया मिलेगा पर कमलेश जी से ये उम्मीद नहीं थी की वो ऐसा गुलाब देंगे.श्रीमान हम आपसे प्रेम करते हैं परन्तु इस प्रेम की ऐसी परीक्षा तो मत लीजिये.ऐसा गुलाबों का गुलदस्ता देने से तो अच्छा होता की आप चमेली  का फूल थमा देते या फिर अपने इश्क का इज़हार-ए -बयान ही न करते . आपका एक उत्तरदायित्व  है जो हमसे कहीं ज्यादा है क्योंकि आपके पास एक माध्यम (मीडियम) है लोगों तक पहुँचने का तो बेहतर तो ये होगा की आप सरकारी रेडियो चैनल्स     की तरह केवल सकारात्मक बातें करें और उन्ही मुद्दों को अपने कार्यक्रम में शामिल करें,उसके अतिरिक्त कुछ भी नही पर तब आपको टी.आर.पी. की चिंता भी घेर सकती है.अग़र आपने आज बार-बार अपनी बात दोहराई न होती तो शायद मैं  ये पत्र कभी न लिखती पर क्या करूँ रोक नही पायी अपना इज़हार-ए- इश्क  क्योंकि भारत की मिटटी से प्यार करती हूँ.अग़र आप पूछेंगे कि  मैंने इसके लिए क्या किया तो मैं कहूँगी कि  अग़र कुछ अच्छा नही तो कुछ बुरा भी नहीं किया.इसके लिए अग़र  मैंने आज तक आवाज़ नही उठाई तो आवाज़ उठाने वालों को ग़लत भी नहीं ठहरा सकी. न मेरे पास खोने के लिए नौकरी है,न ही काले धन के पकडे जाने का dar ,न रिश्वत  और घूसखोरी में पकडे जाने की शंका,न मैं  अनशन पर बैठी हूँ,न ही बैठूंगी,पर जो बैठा है उसे ग़लत भी नहीं कहूँगी क्योंकि मैं  एक किन्कर्त्व्यविमूध  (kaamchor ) नागरिक हूँ जिसने  केवल अपने घर-परिवार और करियर तक ही सोचा देश के लिए न तो कुछ किया है अब तक और न ही अभी इतना साहस  है कि  ऐसा  कुछ कर सकूँ  पर जो कर रहा है कम  से कम  उस पर उंगली  तो नहीं उठा  सकती. 
                                    आपसे दिल  की बात इसलिए  कह दी क्योंकि आप  पर अपना कुछ हक  समझते  हैं क्योंकि आप हमारे बीच  हैं और हम सब के करीब  भी,वरना  दिग्विजय  सिंह  से तो हमारा  कोई नाता  है नहीं और न ही कपिल  सिब्बल  जी से और वो लोग जब इतने सारे  लोगों की आवाज़ यूँ  ही दबा  सकते है तो फिर हम   किस  खेत  की मूली  हैं. आज आपने  पहली  बार हमें मौका दिया  है और साथ ही तरीका भी आपने ही सिखाया  है की कैसे  आपसे इज़हार-ए-इश्क किया जाए  .आपसे बहुत  कुछ सीखा   है और सीखती  रहूंगी  और हमारा  प्यार इतना कमज़ोर  नहीं की इतनी आसानी  से ये रिश्ता टूट  जाये, बिलकुल नहीं.आप कल भी हमारे चहीते  "Subahman" थे आज भी हैं और कल भी रहेंगे .इस बहस  में "हार -जीत " चाहे जिसकी हो पर हमने बड़ी किस्मत से आपको "अर्जित " किया है और आप हमारे ही रहेंगे .आशा  करती हूँ की आप मेरा प्रेम-पत्र पढ़ कर कूड़ेदान  (dustbin )  में तो नहीं डालेंगे . 
"जय हिंद ,जय  भारत"
                                                                                                                                         आपकी  अपनी
                                                                                                                                          मिर्ची  तानपुरी 
                                                                                                                                             "सुन्दरम "